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Sunday, 31 August 2025

सुदामा का बलिदान और कृष्ण की लीला

 जैसे ही द्वारकाधीश ने तीसरी मुट्ठी चावल उठा कर फाँक लगानी चाही, रुक्मिणी ने जल्दी से उनका हाथ पकड़ कर कहा, " क्या भाभी के लाये इन स्वादिष्ट चावलों के स्वाद का सारा सुख अकेले ही उठाएंगे स्वामी? हमें भी तो ये सुख उठाने का अवसर दीजिये।"

द्वारकधीश के अधरों पर एक अर्थपूर्ण स्मित उपस्थित हो गयी। उन्होंने चावल वापस उसी पोटली में डाले और उसे उठाकर अपनी पटरानी को दे दिया।

सुदामा के साथ बातें करते हुए कब कृष्ण उनके पाँव दबाने लगे ये सुदामा को पता ही नही चला। सुदामा सो चुके थे किंतु कृष्ण अपनी ही सोंचों में मगन उनके पाँव दबाते हुए बचपन की बातें करते चले जा रहे थे, कि तभी रुक्मिणी ने उनके कंधे पर हाथ रखा।

कृष्ण ने चौंक कर पहले उन्हे देखा और फिर सुदामा को, फिर उनका आशय समझ कर वहाँ से उठ कर अपने कक्ष में चले आये।


कृष्ण की ऐसी मगन अवस्था देखकर रुक्मिणी ने पूछा, "स्वामी आज आपका व्यवहार बहुत ही विचित्र प्रतीत हो रहा है। आप, जो इस संसार के बड़े से बड़े सम्राट के द्वारका आने पर उनसे तनिक भी प्रभावित नही होते हैं, वो अपने मित्र के आगमन की सूचना पर इतने भावविव्हल हो गए कि भोजन छोड़कर नंगे पाँव उन्हे लेने के लिए भागते चले गए।

आप, जिनको कोई भी दुख, कष्ट या चुनौती कभी रुला नही पाई, यहाँ तक कि जो गोकुल छोड़ते समय मैया यशोदा के अश्रु  देखकर भी नही रोये, वे अपने मित्र के जीर्ण शीर्ण, घावों से भरे पाँवों को देखकर इतने भावुक हो गए कि अपने अश्रुओं से ही उनके पाँवों को धो दिया।

कूटनीति, राजनीति और ज्ञान के शिखर पुरुष आप, अपने मित्र को देखकर इतने मगन हो गए कि बिना कुछ भी विचार किये उन्हे समस्त त्रिलोक की संपदा एवं समृद्धि देने जा रहे थे।"

कृष्ण ने अपनी उसी आमोदित अवस्था में कहा, "वह मेरे बालपन का मित्र है रुक्मिणी।"

"परंतु उन्होंने तो बचपन में आपसे छुपाकर वो चने भी खाये थे जो गुरुमाता ने उन्हे आपसे बाँटकर खाने को कहे थे? अब ऐसे मित्र के लिए इतनी भावुकता क्यों?", सत्यभामा ने भी अपनी जिज्ञासा रखी।

कृष्ण मुस्कुराये, " सुदामा ने तो वह कार्य किया है सत्यभामा, कि समस्त सृष्टि को उसका आभार मानना चाहिए। वो चने उसने इसलिए नहीं खाये थे कि उसे भूँख लगी थी बल्कि उसने इसलिए खाये थे क्योंकि वो नही चाहता था कि उसका मित्र कृष्ण दरिद्रता देखे। उसे ज्ञात था कि वे चने आश्रम में चोर छोड़कर गए थे, और उसे यह भी ज्ञात था कि उन चोरों ने वे चने  एक ब्राह्मणी के गृह से चुराए थे। उसे यह भी ज्ञात था कि उस ब्राह्मणी ने यह श्राप दिया था कि जो भी उन चनों को खायेगा, वह जीवन पर्यंत दरिद्र ही रहेगा। सुदामा ने वे चने इसलिए मुझसे छुपा कर खाये ताकि मैं सुखी रहूँ। वो मुझसे ईश्वर का कोई अंश समझता था, तो उसने वे चने इसलिए खाये क्योंकि उसे लगा कि यदि ईश्वर ही दरिद्र हो जायेगा तो संपूर्ण सृष्टि ही दरिद्र हो जायेगी। सुदामा ने संपूर्ण सृष्टि के कल्याण के लिए स्वय का दरिद्र होना स्वीकार किया।"

"इतना बड़ा त्याग!", रुक्मिणी के मुख से स्वतः ही निकला।

"मेरा मित्र ब्राह्मण है रुक्मिणी, और ब्राह्मण ज्ञानी और त्यागी ही होते हैं। उनमें जनकल्याण की भावना कूट कूट कर भरी होती है। इक्का दुक्का अपवादों को यदि छोड़ दिया जाए तो ब्राह्मण ऐसे ही होते हैं।

अब तुम ही बताओ ऐसे मित्र के लिए ह्रदय में प्रेम नही तो फिर क्या उत्पन्न होगा प्रिये? गोकुल छोड़ते हुए मैं इसलिए नही रोया था क्योंकि यदि मैं रोता तो मेरी मैया तो प्राण ही छोड़ देती। परंतु मेरे मित्र के ऐसे पाँव देखकर, उनमें ऐसे घावों को देखकर मेरा ह्रदय भर आया रुक्मिणी। उसके पाँवों में ऐसे घाव और जीवन में उसकी ऐसी दशा मात्र इसलिए हुई क्योंकि वह अपने इस मित्र का भला चाहता था।

पता है रुक्मिणी, परिवार को छोड़कर किसी और ने कभी इस कृष्ण का इतना भला नही चाहा। लोग बाग तो मुझसे उनका भला करने की अपेक्षा रखते हैं। बस सुदामा जैसे मित्र ही होते हैं जो अपने मित्र के सुख के लिए स्वेच्छा से दरिद्रता एवं कष्ट का आवरण ओढ़ लेते हैं।

ऐसे मित्र दुर्लभ होते हैं और न जाने किन पुण्यों के फलस्वरूप मिलते हैं। अब ऐसे मित्र को यदि त्रिलोक की समस्त संपदा भी दे दी जाए तो भी कम होगा।", कृष्ण अपने भावुकता से भर्राये हुए स्वर में बोले।

इधर कक्ष में समस्त रानियों के नेत्र सजल थे और उधर कक्ष के बाहर खड़े सुदामा के नेत्रों से गंगा यमुना बह रही थीं।


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Wednesday, 27 August 2025

“ऋषि पंचमी”-ऋषि पंचमी का महत्व और पूजाविधि-ऋषि पंचमी व्रत की कथा

  भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का प्रारम्भ बुधवार 27 अगस्त 2025 को सायं 03:44 पर हो रहा है, जो अगले दिन गुरुवार 28 अगस्त 2025 को सायं 05:56 तक रहेगी।  

 धार्मिक मान्यतानुसार, ऋषि पंचमी का अवसर मुख्य रूप से सप्तर्षि के रूप में प्रसिद्ध सात महान ऋषियों को समर्पित है। ऋषि पंचमी के दिन पूरे विधि-विधान के साथ ऋषियों के पूजन के बाद कथापाठ और व्रत रखा जाता है।  

 ऋषि पंचमी का पवित्र दिन महान भारतीय ऋषियों की स्मृति में मनाया जाता है। सप्तर्षि से जुड़े हुए सात ऋषियों के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने पृथ्वी से बुराई को खत्म करने के लिए स्वयं के जीवन का त्याग किया और मानव जाति के सुधार के लिए काम किया। हिंदू मान्यताओं और शास्त्रों में, यह उल्लेख किया गया है कि ये संत अपने भक्तों को अपने ज्ञान और बुद्धि से शिक्षित करते हैं ताकि हर कोई दान, मानवता और ज्ञान के मार्ग का पालन कर सके।

  ऋषि पंचमी का महत्व और पूजाविधि

 मान्यता है कि इस दिन व्रत रखना काफी ज्यादा फलदायी होता है इस व्रत को भक्ति और श्रद्धा के साथ किया जाता है। इस दिन ऋषियों का पूर्ण विधि-विधान से पूजन के बाद कथा सुनने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि यह व्रत लोगों के पापों का नाश करता है और अच्छे फल देता है। यह व्रत और ऋषियों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता, समर्पण और सम्मान की भावना को दर्शाता है।

 ऋषि पंचमी के दिन महिलाएं सरोवर या नदी विशेषकर गंगा में स्नान करती हैं। ऐसी मान्यता है कि रजस्वला के समय होने वाली तकलीफ तथा अन्य दोष के निवारण के लिए महिलाएं ऋषि पंचमी का व्रत करती हैं और स्नान करती हैं। आज के दिन महिलाएं सप्तऋषियों की पूजा करती हैं और दोष निवारण के लिए कामना करती हैं  पहले यह व्रत सभी वर्णों के पुरुषों के लिए बताया गया था लेकिन समय के साथ-साथ अब यह व्रत अधिकतर महिलाएँ करती है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। 

ऋषि पंचमी की पूजा में महिलाएं सप्त ऋषियों की मूर्ति बनाती हैं और उसकी पूजा करती हैं। इसमें प्रथम पूज्य श्री गणेश जी की पूजा भी की जाती है। उसके बाद ऋषि पंचमी की कथा सुनती हैं। ऋषि पंचमी के व्रत में महिलाएं फलाहार करती हैं और अन्य व्रत के नियमों का पालन करती हैं। दिन के अंत में ब्राह्मणों को भोजन कराती हैं और स्वयं पारण कर व्रत को पूर्ण करती हैं। ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पढ़ने के लिये हमारा फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को लाईक एवं फॉलो करें। अब आप हमारी पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी देख सकते हैं। चैनल लिंक हमारी फेसबुक पोस्टों में देखें। इस व्रत में दिन में एक बार भोजन करना चाहिए।

 ऋषि पंचमी की पूजा के लिए सप्तऋषियों की प्रतिमाओं की स्थापना कर उन्हें पंचामृत स्नान दें, जिसके बाद उनपर चंदन का लेप लगाएँ और फूलों एवं सुगंधित पदार्थों, दीप, धूप आदि अर्पण करें इसके साथ ही श्वेत वस्त्रों, यज्ञोपवीतों और नैवेद्य से पूजा और मंत्र का जाप करें।

ऋषि पंचमी व्रत की कथा

  काफी समय पहले विदर्भ नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहते थे, उनके परिवार में एक पुत्र व पुत्री थी। ब्राह्मण पुत्री का विवाह अच्छे ब्राह्मण कुल में कर देता है लेकिन काल के प्रभाव स्वरूप कन्या का पति अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है। जिसके बाद विधवा अपने घर लौट जाती है।

          एक दिन आधी रात में विधवा के शरीर में कीड़े पैदा होने लगते हैं। ऐसी हालत देखकर उसके पिता एक ऋषि के पास ले जाते हैं। ऋषि कहते हैं कि कन्या पूर्व जन्म में ब्राह्मणी थी और इसनें एक बार रजस्वला होने पर भी घर के बर्तन छू लिए और काम करने लगी। बस इसी पाप की वजह से इसके शरीर में कीड़े पड़ गए। 

          दरअसल, शास्त्रों में रजस्वला स्त्री का कार्य निषेध बताया गया है लेकिन इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया और इसका दण्ड भोगना पड़ रहा है। तब ऋषि कहते हैं कि अगर वह कन्या ऋषि पंचमी का व्रत करें और पूरे श्रद्धा भाव के साथ पूजा और क्षमा प्रार्थना करे और उसे अपने पापों से मुक्ति मिल जाएगी।

          इस प्रकार कन्या द्वारा ऋषि पंचमी का व्रत करने से उसे पापों से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।


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Sunday, 24 August 2025

श्री गणेश जी के एकदंत होने की कथा

 भगवान श्रीगणेश जी को एकदंत (एक दाँत वाले) भी कहा जाता है। उनके एकदंत होने के पीछे कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। उनमें से प्रमुख कथाएँ इस प्रकार हैं—

1. महाभारत लेखन की कथा

ऋषि वेदव्यास जी जब महाभारत की रचना कर रहे थे, तो उन्हें कोई ऐसा चाहिए था जो बिना रुके उसे लिख सके। तब उन्होंने भगवान गणेश को बुलाया।

गणेश जी ने शर्त रखी कि वे लिखते समय बीच में रुकेंगे नहीं।

व्यास जी ने भी शर्त रखी कि गणेश जी बिना अर्थ समझे कुछ भी नहीं लिखेंगे।

जब लेखन के दौरान कलम टूट गई, तो गणेश जी ने बिना रुके लिखने के लिए अपना एक दाँत तोड़कर कलम बना लिया और लेखन जारी रखा।

तभी से वे एकदंत कहलाए।

2. परशुराम जी का क्रोध

एक और कथा के अनुसार, एक बार परशुराम जी भगवान शिव से मिलने कैलाश पर्वत पर पहुँचे। उस समय शिव जी विश्राम कर रहे थे और माता पार्वती ने गणेश जी को द्वार पर पहरा देने के लिए बैठाया था।

जब परशुराम जी ने अंदर जाने का प्रयास किया, तो गणेश जी ने उन्हें रोक दिया। परशुराम जी को क्रोध आ गया और उन्होंने अपने परशु (फरसा) से गणेश जी पर प्रहार किया।

यह परशु स्वयं भगवान शिव का दिया हुआ था, इसलिए गणेश जी ने उसका सम्मान करते हुए प्रहार को झेला और उनका एक दाँत टूट गया। तभी से वे एकदंत कहलाए।

3. गणेश जी और चंद्रमा

एक कथा यह भी है कि एक बार गणेश जी अपने वाहन मूषक पर सवार होकर जा रहे थे। रास्ते में मूषक किसी साँप को देखकर डर गया, जिससे गणेश जी गिर पड़े और उनका एक दाँत टूट गया।

इस घटना को देखकर चंद्रमा हँसने लगा। तब गणेश जी ने क्रोधित होकर चंद्रमा को श्राप दिया कि जो भी भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा को देखेगा उसे कलंक लगेगा।

तभी से गणेश जी को एकदंत कहा जाने लगा।

 इस प्रकार भगवान गणेश जी का एकदंत रूप ज्ञान, बलिदान, और धर्म की रक्षा का प्रतीक है।


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Saturday, 23 August 2025

मनुष्य के बार बार जन्म-मरण का क्या कारण है ?

 एक बार द्वारकानाथ श्रीकृष्ण अपने महल में दातुन कर रहे थे। रुक्मिणी जी स्वयं अपने हाथों में जल लिए उनकी सेवा में खड़ी थीं। अचानक द्वारकानाथ हंसने लगे। रुक्मिणी जी ने सोचा कि शायद मेरी सेवा में कोई गलती हो गई है; इसलिए द्वारकानाथ हंस रहे हैं।

रुक्मिणी जी ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, ‘प्रभु! आप दातुन करते हुए अचानक इस तरह हंस क्यों पड़े, क्या मुझसे कोई गलती हो गई? कृपया, आप मुझे अपने हंसने का कारण बताएं।’

श्रीकृष्ण बोले, ‘नहीं, प्रिये! आपसे सेवा में त्रुटि होना कैसे संभव है? आप ऐसा न सोचें, बात कुछ और है।’

रुक्मिणी जी ने कहा, ‘आप अपने हंसने का रहस्य मुझे बता दें तो मेरे मन को शान्ति मिल जाएगी; अन्यथा मेरे मन में बेचैनी बनी रहेगी।’


तब श्रीकृष्ण ने मुसकराते हुए रुक्मिणी जी से कहा, ‘देखो, वह सामने एक चींटा चींटी के पीछे कितनी तेजी से दौड़ा चला जा रहा है। वह अपनी पूरी ताकत लगा कर चींटी का पींछा कर उसे पा लेना चाहता है। उसे देख कर मुझे अपनी मायाशक्ति की प्रबलता का विचार करके हंसी आ रही है।’

रुक्मिणी जी ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा, ‘वह कैसे प्रभु? इस चींटी के पीछे चींटे के दौड़ने पर आपको अपनी मायाशक्ति की प्रबलता कैसे दीख गई?’

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, ‘मैं इस चींटे को चौदह बार इंद्र बना चुका हूँ। चौदह बार देवराज के पद का भोग करने पर भी इसकी भोगलिप्सा समाप्त नहीं हुई है। यह देख कर मुझे हंसी आ गई।’

इंद्र की पदवी भी भोग योनि है। मनुष्य अपने उत्कृष्ट कर्मों से इंद्रत्व को प्राप्त कर सकता है। सौ अश्वमेध यज्ञ करने वाला व्यक्ति इंद्र पद प्राप्त कर लेता है। लेकिन जब उनके भोग पूरे हो जाते हैं तो उसे पुन: पृथ्वी पर आकर जन्म ग्रहण करना पड़ता है।

प्रत्येक जीव इंद्रियों का स्वामी है; परंतु जब जीव इंद्रियों का दास बन जाता है तो जीवन कलुषित हो जाता है और बार-बार जन्म मरण के बंधन में पड़ता है। वासना ही पुनर्जन्म का कारण है। जिस मनुष्य की जहां वासना होती है, उसी के अनुरूप ही अंतसमय में चिंतन होता है और उस चिंतन के अनुसार ही मनुष्य की गति, ऊंच नीच योनियों में जन्म होता है। अत: वासना को ही नष्ट करना चाहिए। वासना पर विजय पाना ही सुखी होने का उपाय है।

बुझै न काम अगि डालते जाइये, वह और भी धधकेगी, यही दशा काम की है। उसे बुझाना हो तो संयम रूपी शीतल जल डालना होगा।

संसार का मोह छोड़ना बहुत कठिन है। वासनाएं बढ़ती हैं तो भोग बढ़ते हैं, इससे संसार कटु हो जाता है। वासनाएं जब तक क्षीण न हों तब तक मुक्ति नहीं मिलती है। पूर्वजन्म का शरीर तो चला गया परन्तु पूर्वजन्म का मन नहीं गया।

नास्ति तृष्णासमं दु:खं नास्ति त्यागसमं सुखम्।

सर्वांन् कामान् परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते ।।

तृष्णा के समान कोई दु:ख नहीं है और त्याग के समान कोई सुख नहीं है। समस्त कामनाओं, मान, बड़ाई, स्वाद, शौकीनी, सुख भोग, आलस्य आदि का परित्याग करके केवल भगवान की शरण लेने से ही मनुष्य ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है।

नहीं है भोग की वांछा न दिल में लालसा धन की।

प्यास दरसन की भारी है सफल कर आस को मेरी।।



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महाभारत के श्रीकृष्ण और उनका रथ

 महाभारत के युद्ध में अर्जुन जब कौरवों के विरुद्ध लड़ने से विचलित हुए, तब उन्होंने अपने सारथी श्रीकृष्ण से कहा –

"मैं अपने बंधु-बांधवों पर शस्त्र कैसे उठाऊँ?" 

तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को धर्म और कर्तव्य का उपदेश दिया, जिसे हम आज श्रीमद्भगवद्गीता के नाम से जानते हैं। 

 युद्ध में श्रीकृष्ण ने स्वयं शस्त्र नहीं उठाया, केवल अर्जुन के रथ के सारथी बने।

लेकिन वह रथ साधारण नहीं था –

उसमें हनुमानजी ध्वज पर विराजमान थे,स्वयं कृष्ण सारथी थे,

और अर्जुन धनुष-बाण से युद्ध कर रहे थे।

युद्ध समाप्त होने के बाद, जैसे ही श्रीकृष्ण रथ से उतरे, वह दिव्य रथ तुरंत जलकर भस्म हो गया। 

अर्जुन आश्चर्यचकित हुए, तब कृष्ण मुस्कुराकर बोले –

"पार्थ! यह रथ पहले ही शस्त्रों की मार से नष्ट हो चुका था। मेरी उपस्थिति के कारण ही यह अब तक सुरक्षित रहा।"

 यह कथा सिखाती है कि जीवन का रथ तभी सुरक्षित रहता है जब उसमें सारथी स्वयं भगवान हों।

जब कृष्ण सारथी बनते हैं, तो युद्ध कितना भी कठिन क्यों न हो – विजय निश्चित है। 

#जयश्रीकृष्ण #पार्थसारथी #महाभारत #श्रीमद्भगवद्गीता #


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Thursday, 7 November 2024

संत श्री जलाराम बापा का जीवन चरित्र जाने

 संत श्री जलाराम बापा जयंती 

➡ 08 नवम्बर 2024 शुक्रवार को संत श्री जलाराम बापा जयंती है ।

जलाराम बापा का जन्म सन्‌ 1799 में गुजरात के राजकोट जिले के वीरपुर गॉंव में हुआ था। उनके पिता का नाम प्रधान ठक्कर और मॉं का नाम राजबाई था। बापा की माँ एक धार्मिक महिला थी, जो साधु-सन्तों की बहुत सेवा करती थी। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर संत रघुवीर दास जी ने आशीर्वाद दिया कि उनका दुसरा प़ुत्र जलाराम ईश्वर तथा साधु-भक्ति और सेवा की मिसाल बनेगा।

 16 साल की उम्र में श्री जलाराम का विवाह वीरबाई से हुआ। परन्तु वे वैवाहिक बन्धन से दूर होकर सेवा कार्यो में लगना चाहते थे। जब श्री जलाराम ने तीर्थयात्राओं पर निकलने का निश्चय किया तो पत्नी वीरबाई ने भी बापा के कार्यो में अनुसरण करने में निश्चय दिखाया। 18 साल की उम्र में जलाराम बापा ने फतेहपूर के संत श्री भोजलराम को अपना गुरू स्वीकार किया। गुरू ने गुरूमाला और श्री राम नाम का मंत्र लेकर उन्हें सेवा कार्य में आगे बढ़ने के लिये कहा, तब जलाराम बापा ने ‘सदाव्रत’ नाम की भोजनशाला बनायी जहॉं 24 घंटे साधु-सन्त तथा जरूरतमंद लोगों को भोजन कराया जाता था। इस जगह से कोई भी बिना भोजन किये नही जा पाता था। वे और वीरबाई मॉं दिन-रात मेहनत करते थे।

बीस वर्ष के होते तक सरलता व भगवतप्रेम की ख्याति चारों तरफ फैल गयी। लोगों ने तरह-तरह से उनके धीरज या धैर्य, प्रेम प्रभु के प्रति अनन्य भक्ति की परीक्षा ली। जिन पर वे खरे उतरे। इससे लोगों के मन में संत जलाराम बापा के प्रति अगाध सम्मान उत्पन्न हो गया। उनके जीवन में उनके आशीर्वाद से कई चमत्कार लोगों ने देखें। जिनमे से प्रमुख बच्चों की बीमारी ठीक होना व निर्धन का सक्षमता प्राप्त कर लोगों की सेवा करना देखा गया। हिन्दु-मुसलमान सभी बापा से भोजन व आशीर्वाद पाते। एक बार तीन अरबी जवान वीरपुर में बापा के अनुरोध पर भोजन किये, भोजन के बाद जवानों को शर्मींदगी लगी, क्योंकि उन्होंने अपने बैग में मरे हुए पक्षी रखे थे। बापा के कहने पर जब उन्होंने बैग खोला, तो वे पक्षी फड़फड़ाकर उड़ गये, इतना ही नही बापा ने उन्हें आशीर्वाद देकर उनकी मनोकामना पूरी की। सेवा कार्यो के बारे में बापा कहते कि यह प्रभु की इच्छा है। यह प्रभु का कार्य है। प्रभु ने मुझे यह कार्य सौंपा है इसीलिये प्रभु देखते हैं कि हर व्यवस्था ठीक से हो सन्‌ 1934 में भयंकर अकाल के समय वीरबाई मॉं एवं बापा ने 24 घंटे लोगों को खिला-पिलाकर लोगों की सेवा की। सन्‌ 1935 में माँ ने एवं सन्‌ 1937 में बापा ने प्रार्थना करते हुए अपने नश्वर शरीर को त्याग दिया।

 आज भी जलाराम बापा की श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करने पर लोगों की समस्त इच्छायें पूर्ण हो जाती है। उनके अनुभव ‘पर्चा’ नाम से जलाराम ज्योति नाम की पत्रिका में छापी जाती है। श्रद्धालुजन गुरूवार को उपवास कर अथवा अन्नदान कर बापा को पूजते हैं।



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Thursday, 3 October 2024

श्रवण कुमार की कथा

  श्रवण कुमार की कथा :-

कर्म ही हमारा वर्तमान और भविष्य है ,

जैसा करोगे वैसा ही भरोगे ,

राजा दशरथ जी के द्वारा किया गया कर्म का फल तो राम जी व उनके पूरे परिवार को भरना पड़ा जबकि राम जी तो भगवान के एक अंशरूप थे l

तो जब भगवान कर्म के फल से नहीं बचे तो हम सब लोग तो एक आम इंसान है l 

पिता के द्वारा किया गया कर्म का फल पुत्र को मिलता है और पिता के द्वारा किया गया कर्म का फल पुत्र को भरना भी पड़ता है l

इसे कहानी के माध्यम से समझते है :-

यह कहानी त्रेता युग की है। उस समय श्रवण कुमार नाम का एक बालक था। उसके माता-पिता अंधे थे और उन्होंने श्रवण को कई मुसीबतों का सामना करते हुए पाला था। श्रवण कुमार बचपन से ही अपने माता-पिता का बहुत आदर करता था। 

जैसे-जैसे श्रवण बड़ा होता गया, उसने घर की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली।

वह रोजाना सुबह उठकर सबसे पहले अपने माता-पिता को स्नान कराने के लिए तालाब से पानी भरकर लाता था। इसके बाद वह तुरंत जंगल की ओर लकड़ियां बीनने जाता। फिर लकड़ियां लाने के बाद श्रवण चूल्हा जलाकर माता-पिता के लिए खाना बनाता था।

श्रवण को इतनी मेहनत करते देख उसकी मां हमेशा उसे टोकती थी। वह कहती थी, “श्रवण बेटा तुम इतना सारा काम अकेले क्यों करते हो? खाना तुम मुझे बनाने दिया करो। मैं आसानी से बना लूंगी। इसके बदले तुम थोड़ा आराम कर लिया करो।”

मां की इन बातों को सुनकर श्रवण कुमार कहता, “नहीं मां, मैं ये सारे काम आप लोगों के लिए ही तो करता हूं। भला अपने मां-बाप के लिए किए गए कामों में कैसी थकान। उल्टा मुझे तो खुशी मिलती है।”

श्रवण कुमार की इन बातों को सुनकर उसकी मां भावुक हो गई। वो रोज भगवान से प्रार्थना करती, “हे प्रभु! इतना ध्यान रखने वाला श्रवण जैसा बेटा हर माता-पिता के घर पैदा हो।”

श्रवण के मां-बाप नियमित रूप से भगवान की आराधना करते थे। वह उनके लिए फूल और पूजा की अन्य सामग्री लाता। फिर खुद भी बिना देर किए माता-पिता के साथ पूजा में शामिल हो जाता था। श्रवण कुमार धीरे-धीरे बड़ा हुआ और जल्दी से घर के कार्यों को खत्म करके बाहर काम पर निकल जाता था।

एक दिन श्रवण अपने माता-पिता के साथ बैठा था, तभी उन्होंने श्रवण से कहा, “बेटा तुमने हमारी हर ख्वाहिश पूरा की है। अब हमारी केवल एक ही इच्छा है, जिसे हम पूरी करना चाहते हैं।

यह सुन श्रवण ने उनसे पूछा, “ऐसी कौन-सी इच्छा बाकी है, जिसे आप पूरा करना चाहते हैं। आप केवल आदेश दें। मैं आपकी हर ख्वाहिश को पूरा करूंगा।”

इस पर श्रवण के पिता ने कहा, “बेटा! अब हम बूढ़े हो चुके हैं और हम चाहते हैं कि मरने से पहले तीर्थ यात्रा के लिए जाएं। भगवान के शरण में जाकर हमें सुकून की प्राप्ति होगी।”

अपने मां-बाप की बात सुनकर श्रवण कुमार सोचने लग गया कि वह उनकी इस इच्छा को कैसे पूरा करेगा। उस समय बस और ट्रेन की सुविधा नहीं थी। साथ ही उसके माता-पिता देख भी नहीं सकते थे। ऐसे में उन्हें तीर्थ यात्रा कराना भला कैसे संभव हो पाता।

फिर श्रवण कुमार ने उस तराजू में अपने मां-बाप को बारी-बारी से गोद में उठाकर बैठा दिया।


उसके बाद तराजू को अपने कंधों पर लेकर उन्हें तीर्थ यात्रा पर लेकर निकल पड़ा। वह लगातार कुछ दिनों तक अपने माता-पिता को एक के बाद एक सभी पवित्र स्थलों पर घुमाने लगा। इस दौरान श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को प्रयाग से लेकर काशी तक के दर्शन कराए।

माता-पिता को घुमाते समय श्रवण कुमार उन्हें उन जगहों के बारे में भी बताते चलता था, क्योंकि वह आंखों से उस दृश्य को नहीं देख सकते थे। अपनी बेटे की मेहनत को देख उसके माता-पिता बहुत खुश थे।

उन्होंने एक दिन श्रवण से कहा, “बेटा, हम देख नहीं सकते, लेकिन कभी भी हमें इस बात का दुख नहीं हुआ। तुम हमारे लिए हमारी आंखें हो। तुमने हमें जिस तरह सारे पवित्र स्थानों की कथा सुनाकर उनके दर्शन कराए हैं, ऐसा लगता है जैसे कि हमने सच में प्रभु के दर्शन अपनी आंखों से किया हो।”

अपनी माता-पिता की बातें सुनकर श्रवण ने कहा, “आप लोग ऐसी बातें न करें। बच्चों के लिए माता-पिता कभी भी बोझ नहीं होते। यह तो बच्चों का धर्म होता है।” एक दिन श्रवण कुमार आराम करने के लिए अयोध्या के पास अपने माता-पिता के साथ रुका। तभी उसकी मां ने पानी पीने की इच्छा जताई। श्रवण को पास में ही एक नदी दिखाई दी। उसने अपने माता-पिता से कहा, “आप दोनों यहां आराम करें, मैं आप लोगों के लिए अभी पानी लेकर आता हूं।”

नदी के पास पहुंचकर श्रवण कुमार कमंडल में पानी भरने लगा। उसी जंगल में अयोध्या के राजा दशरथ भी शिकार के लिए पहुंचे थे। पानी में हलचल की आवाज सुनकर उन्हें लगा कि कोई जानवर पानी पीने आया है। उन्होंने बिना देखे केवल ध्वनि सुनकर ही अपना तीर चला दिया। दुर्भाग्य से वह सीधे श्रवण कुमार को लग गया। तीर लगते ही वह चीख पड़ा।

इसके बाद राजा दशरथ जब अपने शिकार को देखने पहुंचे, तो वहां श्रवण था। वो तुरंत श्रवण कुमार के नजदीक पहुंचे और कहा, “मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मुझे माफ कर दीजिए। मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि यहां कोई मानव होगा। मैं इस गलती का पश्चाताप करने के लिए क्या करूं कि तुम मुझे माफ कर दो।”

तभी करहाते हुए श्रवण कुमार ने कहा, “यहां से थोड़ी ही दूर जंगल में मेरे माता-पिता बैठे हैं। उन्हें काफी प्यास लगी है। आप उन तक यह पानी पहुंचा दीजिए और मेरे बारे में उन्हें कुछ भी न बताएं।” इतना कहते-कहते श्रवण कुमार की सांसें रुक गईं।

श्रवण कुमार की मौत से राजा दशरथ सुन्न पड़ गए। किसी तरह वो श्रवण कुमार के बताए अनुसार जल लेकर उसके माता-पिता के पास पहुंचे। श्रवण के माता-पिता अपने बेटे की आहट को बखूबी पहचानते थे। जब राजा दशरथ उनके करीब पहुंचे तो उन्होंने आश्चर्य से पूछा, “तुम कौन हो और हमारे श्रवण को क्या हुआ? वह क्यों नहीं आया?”

राजा दशरथ उनके सवालों का जवाब नहीं दे पाए। उन्होंने चुपचाप पानी उनकी तरफ बढ़ा दिया। तभी श्रवण की मां ने चिंतित स्वर में जोर से कहा, “तुम कौन हो और मेरा बेटा कहां है, ये बताते क्यों नहीं हो?’

श्रवण की मां की चिंता देखकर राजा दशरथ ने कहा, “मां मुझे माफ कर दीजिए। शिकार करने के लिए मैंने जो तीर चलाया था, वो सीधे आपके बेटे श्रवण को जा लगा। उसने मुझे आप लोगों के बारे में बताया, इसलिए मैं यहां पानी लेकर चला आया।” इतना कहकर राजा दशरथ चुप हो गए।

राजा दशरथ की बात सुनकर श्रवण की मां जोर-जोर से रोने लगी। उन दोनों ने अपने बेटे की मौत के गम में राजा दशरथ के लाए हुए पानी को हाथ तक नहीं लगाया। श्रवण के पिता ने तभी राजा दशरथ को पुत्र वियोग का श्राप दे दिया। कुछ ही देर बाद श्रवण के माता-पिता ने अपने प्राण त्याग दिए l

बताया जाता है कि श्रवण कुमार के पिता के श्राप के परिणामस्वरूप ही राजा दशरथ को अपने पुत्र राम से दूर रहने पड़ा था। 

राजा दशरथ के इस श्राप को पूरा करने के लिए ही भगवान राम को 14 वर्षों का वनवास हुआ, जिसका माध्यम दशरथ की पत्नी कैकेयी बनीं। श्रवण के पिता की ही तरह राजा दशरथ भी अपने बेटे से दूरी को बर्दाश्त नहीं कर पाए और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।

राजा दशरथ जी के द्वारा किया गया कर्म का फल तो राम जी व उनके पूरे परिवार को भरना पड़ा जबकि राम जी तो भगवान के एक अंशरूप थे l

तो जब भगवान कर्म के फल से नहीं बचे तो हम सब लोग तो एक आम इंसान है l 

कहानी से सीख– 

हर बच्चे को अपने माता-पिता की सेवा श्रवण कुमार की तरह ही निस्वार्थ भाव से करनी चाहिए। यही उनका सबसे बड़ा कर्तव्य है ll


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Friday, 27 September 2024

यज्ञोपवीत (जनेउ) के बारे मे संपूर्ण जानकारी

                                    यज्ञोपवीत

      यज्ञ और उपवीत–इन दो शब्दों से यज्ञोपवीत शब्द बना है। वैदिक यज्ञों को करने का अधिकार यज्ञोपवीत संस्कार से प्राप्त होता है। यज्ञोपवीत इस बात का सूचक है कि यह द्विजाति है, इसे वेदाध्ययन एवं वैदिक कर्म का अधिकार प्राप्त है। द्विजाति पुरुष वैदिक कर्मो में अधिकार प्राप्ति के लिये उपनयन-संस्कार द्वारा यज्ञोपवीत धारण करता है। इसीलिये यज्ञोपवीत का एक नाम ब्रह्मसूत्र अर्थात् वेद (ब्रह्म) के अधिकारका सूचक है।

    यज्ञोपवीत वेदाधिकार सूचक है। वेद का मुख्य मन्त्र है–वेदमाता गायत्री। गायत्री में २४ अक्षर हैं। यह मन्त्र चारों वेदों में है। चारों वेदों के गायत्री मन्त्रों की कुल अक्षर-संख्या ९६ हुई। इससे यज्ञोपवीत-सूत्र ९६ अंगुल का होता है। सामवेद के छान्दोग्य परिशिष्ट के अनुसार तत्त्व २५, गुण ३, तिथि १५, वार ७, नक्षत्र २७, वेद ४, काल ३, मास १२–इन सबके योग ९६ अंगुल को यज्ञोपवीत सूत्र का परिमाण रखकर उसे भुवनात्मक प्रतीक माना गया है। उपनीत होने वाले व्यक्ति को ९६ सहस्र वैदिक ऋचाओं का अधिकार प्राप्त है–यह भी यज्ञोपवीत का सूत्र ९६ अंगुल होने में प्रधान हेतु है।

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       यज्ञोपवीत में तीन सूत्र त्रिगुणित किये गये होते हैं। त्रिगुण से निर्मित जगत् में वैदिक त्रयी के आधार से ऋणत्रय (देव-ऋण, ऋषि-ऋण, पितृ-ऋण) से मुक्त होना हमारा कर्तव्य है- यह त्रिगुणित तीनों सूत्र बतलाते हैं।

        इस प्रकार उपर्युक्त विधि से निर्मित यज्ञोपवीत नौ तन्तुवाला बन जाता है। इन नौ तन्तुओं में ॐकार,अग्नि,अनन्त,चन्द्र, पितृगण, प्रजा, वायु, सूर्य, सर्वदेव का निवास है। इनसे उन देवताओं के गुण आते हैं।

    यज्ञोपवीत में चार ग्रन्थि नहीं होती। उसमें अपने प्रवर के अनुसार १, २, ३ या ४ गाँठ होनी चाहिये। यह प्रवर की सूचक है। इन गाँठों से नीचे पहले ब्रह्मग्रन्थि होती है, जो सूचित करती है कि वेदाधिकार प्राप्त करने का तात्पर्य भी सर्वमय–सबमें व्याप्त परम ब्रह्म को प्राप्त करना ही है।

      शास्त्रकारों ने दाहिने कान में आदित्य, वसु, रुद्र वायु, तथा अग्नि आदि देवताओं का निवास माना है।

          आदित्या  वसवो  रुद्रा  वायुरग्निश्च धर्मराट्।

          विप्रस्य दक्षिणे कर्णे नित्यं तिष्ठन्ति देवताः॥

    इसलिये शौचादि के समय जबकि हम अपवित्र दशा में होते हैं, वेद के पवित्र अधिकार के प्रतीक यज्ञोपवीत को दाहिने कान पर चढ़ा लेते हैं। 

   उस समय उसकी पवित्रता की रक्षा उस कर्ण में स्थित देवताओं द्वारा होती है–यही इसका भाव है। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को फॉलो तथा हमारा व्हाट्सएप चैनल भी ज्वॉइन करें। चैनल का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। मनुष्य का हृदय वाम भाग में है–यज्ञोपवीत का उद्देश्य हम हृदय से समझते– मानते हैं और मानेंगे, यह सूचित करता हुआ यज्ञोपवीत वाम कन्धे से होता हुआ, हृदय पर होकर दाहिने आता है। यज्ञोपवीत वेद का सपवित्र प्रतीक है–अत: अपवित्र दशा में उसकी पवित्रता न रखी गयी हो, वह कर्ण स्थित देवताओं को रक्षा के लिये न दिया गया हो तो अपवित्र माना जाता है, अत: बदला जाता है।

    यज्ञोपवीत धारण करके जो संध्या, गायत्री जप नहीं करता वह अनुचित करता है। परंतु जो यज्ञोपवीत धारण ही नहीं करता, उसे तो वैदिक कर्मो के करने का अधिकार ही नहीं है। वह इन्हें करता है तो अनधिकार कार्य का दोषी होता है। इसलिये द्विजाति को यज्ञोपवीत धारण करना ही चाहिये।

    गुणों का धारण तथा अवगुणों का त्याग तो सभी के लिये इष्ट है। जो द्विजाति हैं, उनके लिये भी तथा जो द्विजाति नहीं हैं उनके लिये भी।

          गुणाधान के लिये तामसी पदार्थों का त्याग करना उत्तम बात है। जहाँ तक हो सके राजस पदार्थों का भी त्याग करना चाहिये। इससे सात्त्विक गुणों की अभिवृद्धि में सहायता मिलती है।

                         - श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका

                                               'कल्याण (९४/०७)

                                              गीताप्रेस (गोरखपुर)

                 


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Thursday, 26 September 2024

दिनांक 28.09.2024 दिन शनिवार को आने वाली है इन्दिरा एकादशी की कथा के बारे मे जानिए

   दिनांक 28.09.2024 दिन शनिवार को आने वाली है संवत् २०८१ के आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी :-👇

                            "इन्दिरा एकादशी"

          आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी इन्दिरा एकादशी कहलाती है। जब कभी श्राद्ध, श्रद्धा से न करके दबाव से किया जाता है या अयोग्य व्यक्ति के द्वारा श्राद्ध होता है तो श्राद्ध के बावजूद भी मुक्ति नहीं होती है। इस व्रत के प्रभाव से बड़े-बड़े पापों का नाश होता है। ऐसे में इंदिरा एकादशी का व्रत रखने से पितरों को सद्गति प्राप्त होती है। यह भटकते हुए पितरों की गति सुधारने वाला व्रत है। इस दिन भगवान विष्णु के प्रतीक शालिग्राम जी की उपासना की जाती है। व्रती को शालिग्राम जी को तुलसी पत्र यानि तुलसी का पत्ता अवश्य चढ़ाना चाहिए। शास्त्रों और वैष्णवों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि एकादशी भगवान विष्णु को बहुत प्रिय है। एकादशी का व्रत करने से विष्णु शीघ्र ही प्रसन्न होते है। इस साल यह व्रत 28 सितम्बर शनिवार को है। एकादशी व्रत की विधि यह व्रत दशमी अर्थात एकादशी से एक रात पहले आरम्भ हो जाता है। 

         दशमी की रात को भोजन नहीं किया जाता है। फिर एकादशी के पूरा दिन अन्न नहीं खाना चाहिए। व्रत को निराहार या फलाहार लेकर करें। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को फॉलो तथा लाईक करें और अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें। नोट–अब आप हमारा व्हाट्सएप चैनल भी ज्वॉइन कर सकते हैं। चैनल का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कर व्यक्ति को पूर्णरुप से स्वच्छ हो जाना चाहिए। सूर्यदेव को अर्घ्य दें। 

         उसके बाद भगवान विष्णु के विग्रह के समक्ष घी का दीप प्रज्जवलित करें। ईश्वर का ध्यान लगाकर भजन, चालीसा और आरती कर पूजा करें। एकादशी के व्रत का पारण एकादशी के अगले दिन सुबह किया जाता है। लेकिन व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि में पारण न किया जाए तो व्रत का फल व्रती को प्राप्त नहीं होता है। 

          एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति को वैष्णव धर्म का पालन करना चाहिए। इस दिन व्रती को नामजप अवश्य करना चाहिए। गाय को हरा चारा खिलाएँ। भगवान विष्णु के समक्ष गीता का पाठ करना विशेष फलदायी होता है। काँसे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए। व्रती को अधिकांश समय भजन और प्रभु स्मरण में बिताना चाहिए। सार्वजनिक स्थान पर पीपल का पौधा लगाएँ। इस दिन विशेषतौर पर चावल नहीं खाने चाहिए। रात्रि में जागरण करना चाहिए। उपवास करने वाले व्यक्ति को प्याज, बैंगन, पान-सुपारी, लहसुन व मांस-मदिरा आदि नहीं खाने चाहिए। 

                         इन्दिरा एकादशी की कथा 

          महिष्मतीपुरी के एक राजा थे इन्द्रसेन। धर्मपूर्वक प्रजा के उद्धार के लिए कार्य करते थे साथ ही हरि भक्त भी थे। एक दिन देवर्षि नारद उनके दरबार में आए। राजा ने बहुत प्रसन्न हो उनकी सेवा की और आने का कारण पूछा। देवर्षि ने बताया कि मैं यम से मिलने यमलोक गया, वहाँ मैंने तुम्हारे पिता को देखा। उन्होंने बताया कि व्रतभंग होने के दोष से वो यमलोक की यातनाएं झेलने को मजबूर है। इसलिए उन्होंने तुम्हारे लिए यह संदेश भेजा है कि तुम उनके लिए इन्दिरा एकादशी का व्रत करो। ताकि वो स्वर्गलोक को प्राप्त कर सकें। राजा ने पूछा- कृपा करके इन्दिरा एकादशी के संदर्भ में बताएँ। देवर्षि ने बताया कि आश्विन मास की यह एकादशी पितरों को सद्गति देने वाली है। एकादशी के दिन इस मंत्र का उच्चारण करें- 

            अद्य स्थित्वा निराहारः  सर्वभोगविवर्जितः। 

            श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥

          व्रत में अपना पूरा दिन नियम-संयम के साथ बिताएँ। व्रती को इस दिन आलस्य त्याग कर भजन करना चाहिए। पितरों का भोजन निकाल कर गाय को खिलाएँ। फिर भाई-बन्धु, नाती और पु्त्र आदि को खिलाकर स्वयं भी मौन धारण कर भोजन करना। इस विधि से व्रत करने से आपके पिता की सद्गति होगी। राजा ने इसी प्रकार इन्दिरा एकादशी का व्रत किया। व्रत के फल से राजा के पिता को हमेशा के लिए बैकुण्ठ धाम का वास मिला और राजा भी मृत्योपरांत स्वर्गलोक गए।   


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Wednesday, 25 September 2024

जीवीत्पुत्रीका व्रत–2024 -जितिया सम्पूर्ण पूजन विधि-जीतिया व्रत कथाएँ-जीमूतवाहन की कथा-चिल्हो-सियारो की कथा-

 .                        (जीवीत्पुत्रीका व्रत–2024)

        बुधवार दिनांक 25 सितम्बर 2024 तदनुसार संवत् २०८१ अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आने वाला व्रत–

          हिन्दू पंचांग के अनुसार, हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, 24 सितम्बर को सूर्योदय के उपरांत दोपहर 12:39 पर अष्टमी तिथि प्रारम्भ हो रही है और 25 सितम्बर को दोपहर 12 बजकर 10 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार, जीवित्पुत्रिका व्रत 25 सितम्बर को रखा जाएगा। 24 सितम्बर मंगलवार को नहाए-खाय होगा। 25  सितम्बर बुधवार को निर्जला व्रत रखा जाएगा। 26 सितम्बर गुरुवार को सूर्योदय के बाद व्रत पारण किया जाएगा।

                           जीवीत्पुत्रीका व्रत

          जीवित्पुत्रिका व्रत को जितिया या जिउतिया व्रत भी कहा जाता है। सुहागिन स्त्रियां इस दिन निर्जला उपवास करती हैं। महिलाएँ अपनी सन्तान की लम्बी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए इस व्रत को रखती हैं। यह व्रत मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखण्ड के कई क्षेत्रों में किया जाता है। 

          उत्तर पूर्वी राज्यों में जीवित्पुत्रिका व्रत बहुत लोकप्रिय है। इस जीवीत्पुत्रीका (जीतिया) व्रत के नियम बेहद कठिन होते हैं। जितिया व्रत तीन दिनों तक चलता है। पहला दिन नहाए-खाए, दूसरा दिन जितिया निर्जला व्रत और तीसरे दिन पारण किया जाता है।

                     “जितिया सम्पूर्ण पूजन विधि”

01. स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

02. भगवान जीमूतवाहन की पूजा करें।

03. भगवान जीमूतवाहन की कुशा से निर्मित प्रतिमा को धूप-दीप, चावल, पुष्प आदि अर्पित करें।

04. मिट्टी तथा गाय के गोबर से चील व सियारिन की मूर्ति बनाएं।

05. इनके माथे पर लाल सिन्दूर का टीका लगाएं।

06. जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा कहें या सुनें।

07. माँ को 16 पेड़ा, 16 दूब की माला, 16 खड़ा चावल, 16 गांठ का धागा, 16 लौंग, 16 इलायची, 16 पान, 16 खड़ी सुपारी व श्रृंगार का सामान अर्पित करें।

08. वंश की वृद्धि और प्रगति के लिए उपवास कर बांस के पत्रों से पूजन करें

                            “जीतिया व्रत कथाएँ”

          पार्वतीजी ने एक स्थान पर स्त्रियों को विलाप करते देखा तो शिवजी से उसका कारण पूछा। शिवजी ने बताया–‘इन स्त्रियों के पुत्रों का निधन हो गया है इसलिए ये विलाप कर रही हैं।’

          पार्वतीजी बहुत दुःखी हो गईं। उन्होंने कहा–‘हे नाथ एक माता के लिए इससे अधिक हृदय विदारक बात क्या हो सकती है कि उसके सामने उसका पुत्र मर जाए। इससे मुक्ति का कोई तो मार्ग हो, कृपया बतायें।’

          शिवजी ने कहा–‘हे देवी जो विधाता द्वारा रचित है उसमें हेर-फेर नहीं हो सकता किन्तु जीमूतवाहन की पूजा से माताएँ अपनी सन्तान पर आए प्राणघाती संकटों को भी टाल सकती हैं।

          जो माता आश्विन मास की कृष्णपक्ष की अष्टमी को जीमूतवाहन की पूजा विधि-विधान से करेगी उसकी सन्तान के संकटों का नाश होगा।’

          पार्वतीजी के अनुरोध पर शिवजी ने उन मृत बालकों को पुनः जीवित कर दिया। इस कारण ही इसे जीवितपुत्रिका व्रत कहा जाता है।

          जीमूतवाहन की कथा ही मुख्य रूप से सुनी जाती है किन्तु आंचलिक क्षेत्रों में कई कथाएँ प्रचलित हैं जिसमें चिल्हो-सियारो की कथा भी है। आपको जीवितपुत्रिका की संक्षिप्त व्रत कथा सुनाते हैं।

                             “जीमूतवाहन की कथा”

          गन्धर्वों के राजकुमार का नाम जीमूतवाहन था। वे बडे उदार और परोपकारी थे। जीमूतवाहन के पिता ने वृद्धावस्था में वानप्रस्थ आश्रम में जाते समय इनको राजसिंहासन पर बैठाया किन्तु इनका मन राज-पाट में नहीं लगता था।

          वह राज्य का भार अपने भाइयों पर छोडकर स्वयं वन में पिता की सेवा करने चले गए। वन में ही जीमूतवाहन को मलयवती नामक राजकन्या से भेंट हुई और दोनों में प्रेम हो गया।

          एक दिन जब वन में भ्रमण करते हुए जीमूतवाहन काफी आगे चले गए, तब उन्हें एक वृद्धा विलाप करते हुए दिखी। पूछने पर वृद्धा ने रोते हुए बताया–‘मैं नागवंश की स्त्री हूँ। मुझे एक ही पुत्र है। पक्षीराज गरुड के कोप से मुक्ति दिलाने के लिए नागों ने यह व्यवस्था की है वे गरूड को प्रतिदिन भक्षण हेतु एक युवा नाग सौंपते हैं।

          आज मेरे पुत्र शंखचूड की बलि का दिन है। आज मेरे पुत्र के जीवन पर संकट है और थोड़ी देर बाद ही मैं पुत्रविहीन हो जाऊँगी। एक स्त्री के लिए इससे बड़ा दुख क्या होगा कि उसके जीते जी उसका पुत्र न रहे।’

          जीमूतवाहन को यह सुनकर बड़ा दुख हुआ। उन्होंने उस वृद्धा को आश्वस्त करते हुए कहा–‘डरो मत। मैं तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा करूँगा। आज उसके स्थान पर स्वयं मैं अपने आपको उसके लाल कपडे में ढ़ककर वध्य-शिला पर लेटूँगा ताकि गरूड मुझे खा जाए पर तुम्हारा पुत्र बच जाए।’

          इतना कहकर जीमूतवाहन ने शंखचूड के हाथ से लाल कपडा ले लिया और वे उसे लपेटकर गरुड को बलि देने के लिए चुनी गई वध्य-शिला पर लेट गए। नियत समय पर गरुड बडे वेग से आए और वे लाल कपडे में ढ़के जीमूतवाहन को पंजे में दबोचकर पहाड के शिखर पर जाकर बैठ गए।

          गरूड़ ने अपनी कठोर चोंक का प्रहार किया और जीमूतवाहन के शरीर से मांस का बड़ा हिस्सा नोच लिया। इसकी पीड़ा से जीमूतवाहन की आँखों से आँसू बह निकले और वह दर्द से कराहने लगे।

          अपने पंजे में जकड़े प्राणी की आँखों में से आँसू और मुँह से कराह सुनकर गरुड़ बडे आश्चर्य में पड गए क्योंकि ऐसा पहले कभी न हुआ था। उन्होंने जीमूतवाहन से उनका परिचय पूछा। जीमूतवाहन ने सारा किस्सा कह सुनाया कि कैसे एक स्त्री के पुत्र की रक्षा के लिए वह अपने प्राण देने आए हैं। आप मुझे खाकर भूख शांत करें।

          गरुड उनकी बहादुरी और दूसरे की प्राणरक्षा के लिए स्वयं का बलिदान देने की हिम्मत से बहुत प्रभावित हुए। उन्हें स्वयं पर पछतावा होने लगा। 

          वह सोचने लगे कि ‘एक यह मनुष्य है जो दूसरे के पुत्र की रक्षा के लिए स्वयं की बलि दे रहा है और एक मैं हूँ जो देवों के संरक्षण में हूँ किन्तु दूसरों की सन्तान की बलि ले रहा हूँ।’ उन्होंने जीमूतवाहन को मुक्त कर दिया।

          गरूड ने कहा–‘हे उत्तम मनुष्य मै, तुम्हारी भावना और त्याग से बहुत प्रसन्न हूँ। मैंने तुम्हारे शरीर पर जो घाव किए हैं उसे ठीक कर देता हूँ। तुम अपनी प्रसन्नता के लिए मुझसे कोई वरदान मांग लो।’

          राजा जीमूतवाहन ने कहा–‘हे पक्षीराज ! आप तो सर्वसमर्थ हैं। यदि आप प्रसन्न हैं और वरदान देना चाहते हैं तो आप सर्पों को अपना आहार बनाना छोड़ दें। आपने अब तक जितने भी प्राण लिए हैं उन्हें जीवन प्रदान करें।’

          गरुड ने सबको जीवनदान दे दिया तथा नागों की बलि न लेने का वरदान भी दिया। इस प्रकार जीमूतवाहन के साहस से नाग-जाति की रक्षा हुई। 

          गरूड़ ने कहा–‘तुम्हारी जैसी इच्छा वैसा ही होगा। हे राजा! जो स्त्री तुम्हारे इस बलिदान की कथा सुनेगी और विधिपूर्वक व्रत का पालन करेगी उसकी सन्तान मृत्यु के मुख से भी निकल आएगी।’

          तब से ही पुत्र की रक्षा हेतु जीमूतवाहन की पूजा की प्रथा शुरू हो गई।

          यह कथा कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर ने माता पार्वती को सुनाई थी। जीवित पुत्रिका के दिन भगवान श्रीगणेश, माता पार्वती और शिवजी की पूजा एवं ध्यान के बाद ऊपर बताई गई व्रत कथा भी सुननी चाहिए।

          इसकी पूजा शिवजी को प्रिय प्रदोषकाल में करनी चाहिए। व्रत का पारण दूसरे दिन अष्टमी तिथि की समाप्ति के पश्चात किया जाता है।

                           “चिल्हो-सियारो की कथा”

          नर्मदा नदी के पास एक नगर था कंचनबटी। उस नगर के राजा का नाम मलयकेतु था। नर्मदा नदी के पश्चिम में बालुहटा नाम की मरुभूमि थी, जिसमें एक विशाल पाकड़ के पेड़ पर एक चील रहती थी। उसे पेड़ के नीचे एक सियारिन भी रहती थी। दोनों पक्की सहेलियां थीं। 

          दोनों ने कुछ महिलाओं को देखकर जितिया व्रत करने का संकल्प लिया और दोनों ने भगवान श्री जीऊतवाहन की पूजा और व्रत करने का प्रण ले लिया। लेकिन जिस दिन दोनों को व्रत रखना था, उसी दिन शहर के एक बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गई और उसका दाह संस्कार उसी मरुस्थल पर किया गया। 

          सियारिन को अब भूख लगने लगी थी। मुर्दा देखकर वह खुद को रोक न सकी और उसका व्रत टूट गया। पर चील ने संयम रखा और नियम व श्रद्धा से अगले दिन व्रत का पारण किया। “श्रीजी की चरण सेवा” की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ के साथ जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें। अब आप हमारे पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी पा सकते हैं, लिंक हमारी फेसबुक प्रोफाइल पर देखें। अगले जन्म में दोनों सहेलियों ने ब्राह्मण परिवार में पुत्री के रूप में जन्म लिया। उनके पिता का नाम भास्कर था। चील, बड़ी बहन बनी और उसका नाम शीलवती रखा गया। 

          शीलवती की शादी बुद्धिसेन के साथ हुई। सियारन, छोटी बहन के रूप में जन्मी और उसका नाम कपुरावती रखा गया। उसकी शादी उस नगर के राजा मलायकेतु से हुई। 

          अब कपुरावती कंचनबटी नगर की रानी बन गई। भगवान जीऊतवाहन के आशीर्वाद से शीलवती के सात बेटे हुए। पर कपुरावती के सभी बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे। 

          कुछ समय बाद शीलवती के सातों पुत्र बड़े हो गए। वे सभी राजा के दरबार में काम करने लगे। कपुरावती के मन में उन्हें देख ईर्ष्या की भावना आ गयी। 

          उसने राजा से कहकर सभी बेटों के सर काट दिए। उन्हें सात नए बर्तन मंगवाकर उसमें रख दिया और लाल कपड़े से ढककर शीलवती के पास भिजवा दिया। 

          यह देख भगवान जीऊतवाहन ने मिट्टी से सातों भाइयों के सर बनाए और सभी के सिर को उसके धड़ से जोड़कर उन पर अमृत छिड़क दिया। इससे उनमें जान आ गई। 

          सातों युवक जिन्दा हो गए और घर लौट आए। जो कटे सर रानी ने भेजे थे वे फल बन गए। दूसरी ओर रानी कपुरावती, बुद्धिसेन के घर से सूचना पाने को व्याकुल थी। जब काफी देर सूचना नहीं आई तो कपुरावती स्वयं बड़ी बहन के घर गयी। 

          वहाँ सबको जिंदा देखकर वह सन्न रह गयी। जब उसे होश आया तो बहन को उसने सारी बात बताई। अब उसे अपनी गलती पर पछतावा हो रहा था। 

          भगवान जीऊतवाहन की कृपा से शीलवती को पूर्व जन्म की बातें याद आ गईं। वह कपुरावती को लेकर उसी पाकड़ के पेड़ के पास गयी और उसे सारी बातें बताईं। 

          कपुरावती बेहोश हो गई और मर गई। जब राजा को इसकी खबर मिली तो उन्होंने उसी जगह पर जाकर पाकड़ के पेड़ के नीचे कपुरावती का दाह-संस्कार कर दिया !


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Monday, 23 September 2024

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की प्रार्थना का हिन्दी में अनुवाद

RSS की प्रार्थना का हिन्दी में अनुवाद ... पढ़ो और सोचिये  कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भारत माता के प्रति भावना क्या है 🚩

1. नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे, त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोsहम्। 🚩

हे प्यार करने वाली मातृभूमि! मैं तुझे सदा (सदैव) नमस्कार करता हूँ। तूने मेरा सुख से पालन-पोषण किया है। 🚩

2. महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे, पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते।। १।। 🚩

हे महामंगलमयी पुण्यभूमि! तेरे ही कार्य में मेरा यह शरीर अर्पण हो। मैं तुझे बारम्बार नमस्कार करता हूँ। 🚩

3. प्रभो शक्ति मन्हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता, इमे सादरं त्वाम नमामो वयम् त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयं, शुभामाशिषम देहि तत्पूर्तये। 🚩

हे सर्वशक्तिशाली परमेश्वर! हम हिन्दूराष्ट्र के सुपुत्र तुझे आदर सहित प्रणाम करते है। तेरे ही कार्य के लिए हमने अपनी कमर कसी है। उसकी पूर्ति के लिए हमें अपना शुभाशीर्वाद दे। 🚩

4. अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिम, सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्, श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं, स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत्।। २।। 🚩

हे प्रभु! हमें ऐसी शक्ति दे, जिसे विश्व में कभी कोई चुनौती न दे सके, ऐसा शुद्ध चारित्र्य दे जिसके समक्ष सम्पूर्ण विश्व नतमस्तक हो जाये। ऐसा ज्ञान दे कि स्वयं के द्वारा स्वीकृत किया गया यह कंटकाकीर्ण मार्ग सुगम हो जाये। 🚩

5. समुत्कर्षनिःश्रेयसस्यैकमुग्रं, परं साधनं नाम वीरव्रतम् दन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा, हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्राsनिशम्। 🚩

उग्र वीरव्रती की भावना हम में उत्स्फूर्त होती रहे, जो उच्चतम आध्यात्मिक सुख एवं महानतम ऐहिक समृद्धि प्राप्त करने का एकमेव श्रेष्ठतम साधन है। तीव्र एवं अखंड ध्येयनिष्ठा हमारे अंतःकरणों में सदैव जागती रहे। 🚩

6. विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्, विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्। परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं, समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्।। ३।। ।। भारत माता की जय।। 🚩

हे माँ  तेरी कृपा से हमारी यह विजयशालिनी संघठित कार्यशक्ति हमारे धर्म का सरंक्षण कर इस राष्ट्र को वैभव के उच्चतम शिखर पर पहुँचाने में समर्थ हो। भारत माता की जय।.. 🚩🇮🇳🇮🇳🇮🇳



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