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Sunday, 24 August 2025

जानिए भगवान विष्णु ने क्यों लिया था वराह अवतार

 भगवान विष्णु ने कुल 24 अवतार लिए हैं। मत्स्य और कश्यप के बाद तीसरा अवतार है वराह। वराह यानी शुकर। इस अवतार के माध्यम से मानव शरीर के साथ परमात्मा का पहला कदम धरती पर पड़ा। मुख शुकर का था, लेकिन शरीर इंसानी था। उस समय हिरण्याक्ष नामक दैत्य ने अपनी शक्ति से स्वर्ग पर कब्जा कर पूरी पृथ्वी को अपने अधीन कर लिया था। हिरण्याक्ष का अर्थ है हिरण्य मतलब स्वर्ण और अक्ष मतलब आंखें। जिसकी आंखें दूसरे के धन पर लगी रहती हों, वो हिरण्याक्ष है।  


पुरातन समय में दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया तब ब्रह्मा की नाक से भगवान विष्णु वराह रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु के इस रूप को देखकर सभी देवताओं व ऋषि-मुनियों ने उनकी स्तुति की। सबके आग्रह पर भगवान वराह ने पृथ्वी को ढूंढना प्रारंभ किया। अपनी थूथनी की सहायता से उन्होंने पृथ्वी का पता लगा लिया और समुद्र के अंदर जाकर अपने दांतों पर रखकर वे पृथ्वी को बाहर ले आए। जब हिरण्याक्ष दैत्य ने यह देखा तो उसने भगवान विष्णु के वराह रूप को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर दिया। इसके बाद भगवान वराह ने अपने खुरों से जल को स्तंभित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया। इसके पश्चात भगवान वराह अंतर्धान हो गए।


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Monday, 16 December 2024

ऋषि दुर्वासा और 'इनके पत्नी कंदली' की कहानी केले के पेड़की कथा

 

केले के पेड़ के उत्पन्न होनेकी कहानी बहुत ही रोचक है, जो कि ऋषि दुर्वासा के क्रोध से जुड़ी हुई है!ऋषि दुर्वासा के क्रोध का परिणाम है केले का पेड़ ऋषि पत्नी कंदली के भस्म होने से उत्पन्न हुआ केला! पूजा व्रत विधान में केले का फल प्रसाद में, केले के पत्ते पूजा स्थल को सजाने में और केले का पौधा किसी भी स्थान को पूजा स्थल की मान्यता देने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है.!आरोग्य की नजर में भी संपूर्ण आहार वाला फल केला है, आध्यात्म की नजर में भी बहुत पवित्र और पूजनीय है. इसके चौड़े पत्तों में श्रीहरि का वास माना जाता है तो जड़ों में महादेव का जिसे मूल शंकर कहते हैं. !कैसे हुआ इसका जन्म, पुराणों में इसकी कथा भी बहुत रोचक है. !इसका वर्णन पुराण कथा में मिलता है, जिसका संबंध सबसे क्रोधी ऋषि दुर्वासा से है. !एक कथा के अनुसार महर्षि अत्रि और अनुसूया के पुत्र दुर्वासा बहुत ही क्रोधी स्वभाव के थे. लेकिन उनके अंदर ऋषि संस्कार बचपन से ही प्रबल थे और वह 5 वर्ष की अवस्था आते-आते ध्यान-साधना में लीन रहने लगे थे. दरअसल दुर्वासा खुद महादेव के क्रुद्ध स्वरूप रुद्र के अंश से उत्पन्न हुए थे.!क्रोध ही उनके स्वभाव का मूल था और वह तमाम ज्ञान को पाने के बाद भी इसे नहीं त्याग सके थे. बड़े होते-होते जब माता-पिता ने देखा कि बालक के अंदर वैराग्य अधिक उत्पन्न हो रहा है और वह समाज की व्यवहारिकता को नहीं समझ रहा है तब उन्होंने उनका विवाह ऋषि अंबरीष की कन्या से करा दिया.!ऋषि अंबरीष ने अपनी कन्या के कई गुण बताए और ऋषि दुर्वासा ने माता-पिता की आज्ञा मानकर विवाह कर लिया. ऋषि अंबरीष दुर्वासा की क्रोधाग्नि को जानते थे, इसलिए पुत्री के साथ कोई अनिष्ट न हो इसके लिए भी चिंतित थे. !उन्होंने ऋषि दुर्वासा से पत्नी से कोई भूल हो जाए तो उसे क्षमा कर दिए जाने की प्रार्थना की. तब ऋषि ने उन्हें वचन दिया कि वह अपनी पत्नी के 100 अपराध क्षमा करते रहेंगे. !स्वाभाविक है गृहस्थ जीवन में कुछ बातें ऊपर-नीचे तो होती ही रहती हैं. ऋषि दुर्वासा की पत्नी का नाम था कंदली, जो कि स्वभाव से कर्मठ और बहुत समझदार थीं. वह हर एक बात का ख्याल रखती थीं. किन्तु फिर भी कभी-कभी कुछ न कुछ हो ही जाता था, लेकिन ऋषि ने उन पर कभी क्रोध नहीं किया.उनका मूल स्वभाव जानकर ऋषि उन्हें क्षमा कर देते थे, ऐसा होने से धीरे-धीरे कंदली के स्वभाव में भी निश्चिंतता आने लगी. !लेकिन एक दिन ऋषि दुर्वासा कहीं से प्रवास कर कुछ देरी से आए. रात में भोजन के बाद उन्होंने विश्राम के लिए कहा साथ ही पत्नी से कहा कि मुझे कल ब्रह्म मुहूर्त में जरूर उठा दें. मैं खुद भी कोशिश करूंगा, लेकिन थकान के कारण शायद ऐसा संभव न हो. ब्रह्म मुहूर्त में ऋषिवर को जरूरी अनुष्ठान करना था. !अगली सुबह कंदली की ब्रह्म मुहूर्त में नींद तो खुली, लेकिन आलस के कारण न तो वह खुद उठीं और न हीं ऋषि को उठाया. 

सुबह सूर्योदय के बाद जब ऋषि की आंख खुली तो दिन चढ़ आया था. अपना अनुष्ठान न कर पाने के कारण वह कंदली पर बहुत क्रोधित हुए और उन्हें भस्म हो जाने का श्राप दे दिया. !ऋषि के श्राप का तुरंत असर हुआ और देवी कंदली राख बनकर रह गई. ऋषि को भी इस घटना पर बहुत दुख हुआ, लेकिन अनुशासन स्थापित करने के लिए उन्हें ऐसा करना पड़ा. जब कंदली के पिता ऋषि अंबरीष आए तो अपनी पुत्री को राख बना देखकर बहुत दुखी हुए.तब दुर्वासा ऋषि ने कंदली की राख को पेड़ में बदल दिया और वरदान दिया कि अब से यह हर पूजा व अनुष्ठान में इनका प्रयोग होगा इस तरह से केले के पेड़ का जन्म हुआ और (कदलीफल) यानी केले का फल हर पूजा का प्रसाद बन गया. केले के पेड़ का आध्यात्मिक दृष्टि से भी बहुत महत्व है, इसे भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है,ऋषि दुर्वासा क्रोधी अवश्य थे, किन्तु यह उनके प्रेम की पराकाष्ठा ही थी जो कि देवी कंदली को सदा-सदा के लिए अमर कर दिया !!

🙏🌺हर हर महादेव,,🌺🙏


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Wednesday, 25 September 2024

महाभारत में कर्ण और श्री कृष्ण का रोचक वार्तालाप जानिए

 महाभारत में कर्ण ने श्री कृष्ण से पूछा " मेरी माँ ने मुझे जन्मते ही त्याग दिया ,क्या ये मेरा अपराध था की मैंने मेरी माँ की कोख से एक अवैध बच्चे के रूप में जन्म लिया?

दोर्णाचार्य ने मुझे शिक्षा देने से इनकार कर दिया क्योंकी वो मुझे क्षत्रिय नही मानते थे, क्या ये मेरा कसूर था?

परशुराम जी ने मुझे शिक्षा दी किन्तु ये श्राप भी दिया कि मैं अपनी विद्या भूल जाऊंगा क्योंकी वो मुझे क्षत्रिय समझते थे?

भूलवश एक गौ मेरे तीर के रास्ते मे आकर मर गयी और मुझे गौ वध का श्राप मिला?

द्रोपदी के स्वयंबर में मुझे अपमानित किया गया क्योंकि मुझे किसी राजघराने का कुलीन व्यक्ति नही समझा गया?

यहाँ तक कि मेरी माता कुंती ने भी मुझे अपना पुत्र होने का सच अपने दूसरे पुत्रों की रक्षा के लिए स्वीकारा।

मुझे जो कुछ मिला दुर्योधन की दया स्वरूप मिला!

तो क्या ये गलत है की मैं दुर्योधन के प्रति अपनी वफादारी रखता हूँ?

श्री कृष्ण मंद मंद मुस्कुराते हुए बोले:

कर्ण ,मेरा जन्म जेल में हुआ था!

मेरा पैदा होने से पहले मेरी मृत्यु मेरा इंतज़ार कर रही थी!

जिस रात मेरा जन्म हुआ उसी रात मुझे मेरे माता पिता से अलग होना पड़ा!

मेरा बचपन रथों की धमक,घोड़ों की हिनहिनाहट तीर कमानों के साये में गुज़रा!

मैन गायों को चराया व उनके गोबर को उठाया!

जब मैं चल भी नही पाता था तो मेरे ऊपर प्राणघातक हमले हुए!

कोई सेना नही,कोई शिक्षा नही,कोई गुरुकुल नही,कोई महल नही, मेरे मामा ने मुझे अपना सबसे बड़ा शत्रु समझा!

जब तुम सब अपने वीरता के लिए अपने गुरु व समाज के लिए प्रशंसा पाते थे उस समय मेरे पास शिक्षा भी नही थी। 16 वर्ष की उम्र में मुझे ऋषि सांदीपनि के आश्रम में जाने का अवसर मिला!

तुम्हे अपनी पसंद के जीवनसाथी से विवाह का अवसर मिलता है और मुझे वो भी नही मिली जो मेरी आत्मा में बसती थी!

मुझे बहुत से विवाह राजनैतिक कारणों से या उन स्त्रियों से करने पड़े जिन्हें मैंने राक्षसों से छुड़ाया था!

मुझे जरासंध के प्रकोप के कारण मेरा सारा कुटुम्ब यमुना से ले जाकर सुदूर प्रान्त मे समुद्र के किनारे बसाना पड़ा!दुनिया ने मुझे कायर कहा!

यदि दुर्योधन युद्ध जीत जाता तो विजय का श्रेय तुम्हे भी मिलता, लेकिन धर्मराज के युद्ध जीतने का श्रेय अर्जुन को मिला! मुझे कौरवों ने अपनी हार का उत्तरदायी समझ!

हे कर्ण!किसी का भी जीवन चुनोतियों रहित नही है,सबके जीवन मे सब कुछ ठीक नही होता!कुछ कमियाँ अगर दुर्योधन में थी तो कुछ युधिष्टर में भी थी!

सत्य क्या है और उचित क्या है? ये हम अपनी आत्मा की आवाज़ द्वारा स्वयं निर्धारित करते हैं!

इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कितनी बार हम पर अन्याय होता है, इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कितनी बार हमारा अपमान किया जाता है,इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कितनी बार हमारे अधिकारों का हनन होता है...

फ़र्क़ सिर्फ इस बात से पड़ता है कि हम उन सबका सामना किस प्रकार करते हैं!

जीवन मे यदि हमारे साथ कुछ गलत होता है तो उससे हमे कुछ गलत करने का अधिकार नही मिल जाता,किन्ही एक परिस्थतियों के लिए हम किन्ही दूसरी परिस्थितियों को ज़िम्मेदार नही ठहरा सकते।

जीवन के संघर्षपूर्ण दौर ही हमारी किस्मत तय करते है।

ईश्वर ने हमे दिमाग दिया है लेकिन उसे गलत या सही रूप में इस्तेमाल करने का जिम्मा हमारा है!

ईश्वर ने हमे दो हाथ दिए उनसे धरती से उगता सोना खोदना है या किसी की कब्र ये निर्णय हमारा है!

ईश्वर ने हमे पैर दिये लेकिन उन्हें किस रास्ते पर चलना है ये निर्णय भी हमारा है!

संघर्ष तो दोनों और है लेकिन आप उसका कृष्ण की तरह सामना करते हैं या कर्ण की तरह !!

ये निर्णय हमारा है.

सब समझ गए न।


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Saturday, 21 September 2024

भक्त नीलांबरदास और भगवान जगन्नाथ की कथा

 भगवान् जगन्नाथ के भक्त नीलांबरदास रहते तो उत्तर प्रदेश में थे, किंतु उनका हृदय उड़ीसा के जगन्नाथ भगवान् ने चुरा लिया था।

एक दिन धन-संपत्ति, स्त्री-पुत्र सब को ठोकर मार जगन्नाथ भगवान् के दर्शन के लिए निकल पड़े। चलते-चलते गंगा तट पर पहुँचे, एक मल्लाह बीच गंगा में नौका पर बैठा मछली पकड़ रहा था।

नीलांबरदास ने उसे पुकारा और बोले- भाई! मुझे गंगा पार करा दो, भाड़े की चिंता न करना। मल्लाह लालची था, उसने सोचा यात्री के पास काफी धन है, वह नौका किनारे ले आया।

नीलांबरदास भगवान् जगन्नाथ के नाम का स्मरण करते हुए नौका में बैठ गए। गंगा की बहती धारा में नौका चल पड़ी।

सूर्यदेव अस्त हो चुके थे चारों ओर अंधकार फैलता जा रहा था। मल्लाह नौका को दूसरे तट पर ले जाने के स्थान पर गंगा की उफनती हुई धारा में बहाता ले जा रहा था।

उसने सोचा कि उफनती गंगा के बीच में नीलांबरदास को मारकर फेंक दिया जाए और उनका धन लूट लिया जाए।

जब उसने नीलांबरदास की बात नहीं सुनी, तो उन्हें मल्लाह पर संदेह हुआ और बोले- “भाई! क्या तू मुझे मारना चाहता है ? अच्छा, मैं भी देखता हूँ कि जगन्नाथपुरी के यात्री को कोई कैसे मार सकता है ?

मल्लाह क्रूर अट्टहास करते हुए बोला- मेरी नियत समझने में अब तुम्हें अधिक देर नहीं लगेगी। मैं तुम्हें अभी एक क्षण में ही जगन्नाथ धाम पहुँचाए देता हूँ। तुम्हें जिस-जिसको भी याद करना है, उसे याद कर लो।

नीलांबरदास घबराकर नेत्र मूंदकर मन-ही-मन भगवान् जगन्नाथ को पुकारने लगे : हे भगवन्! एक बार रथ पर आरूढ़ आप जगन्नाथ भगवान् के भाई बलभद्र और बहिन सुभद्रा सहित दर्शन करनेकी अभिलाषा है, फिर चाहे प्राण भले ही चले जाएँ।

हे जगन्नाथ! कृपया इस समय मुझे इस विपत्ति से बचाइए। मल्लाह के होठों पर अभी भी कुटिल मुस्कान नाच रही थी। अचानक पहले तट से एक कड़कती हुई आवाज गूँजी।

मल्लाह और नीलांबरदास ने मुड़कर देखा कि वहाँ एक अत्यंत सुंदर राजपूत युवक धनुष-बाण धारण किए खड़ा है। उसने मल्लाह को डांटते हुए कहा- अरे ओ मल्लाह! तुझे मरने की इच्छा न हो तो नाव झटपट किनारे ले आ।

धनुष-बाणधारी राजपूत को देखकर मल्लाह थर-थर काँपने लगा। उनकी कड़कती आवाज सुनकर उसकी तो जैसे नानी मर गई। किंतु फिर भी वह दुष्ट गंगा की धारा में नौका बहाता रहा।

जब राजपूत द्वारा दूसरी बार चेतावनी देने पर भी उसने उन्हें अनसुना करने की कोशिश की, तो राजपूत ने अपने धनुष पर एक बाण चढ़ाकर छोड़ा, सर्र से बाण आकर नौका में घुस गया।

किनारे से राजपूत का कड़कता स्वर गूँजा- अभी तो नौका पर बाण मारा है, यदि अब भी तट पर नौका नहीं लाया, तो अबकी बार तेरा सिर उड़ा दूँगा।

मल्लाह का चेहरा भय से फीका पड़ गया और उसने नौका तट की ओर वापस मोड़ ली। तट पर पहुँचने पर राजपूत ने मल्लाह को डांटते हुए बोले- इन ब्राह्मण को मेरे सामने ही तुरंत उस पार उतार।

यदि इन्हें कहीं ओर ले गया तो मेरे बाण का ध्यान रखना। मल्लाह ने राजपूत से अपने अपराध की क्षमा माँगी। फिर उस राजपूत युवक ने नीलांबरदास से बड़े प्रेम से कहा- मैंने यह वेश लुटेरों, हत्यारों से पीड़ित यात्रियों की रक्षाके लिए ही धारण किया है।

नीलांबरदास उसके रूप को देखकर मंत्रमुग्ध हो गए और उन्हें निहारते ही रह गए, वे मुख से कुछ भी बोल न सके। मल्लाह ने नीलांबरदास को तुरंत दूसरे तट पर उतार दिया।

राजपूत के रूप सौंदर्य को देखकर मल्लाह का हृदय परिवर्तन हो चुका था और पश्चाताप करते हुए वह नीलांबरदासके पैरों में गिर पड़ा।

नीलांबरदास ने उसे आशीर्वाद दिया और नजर उठाकर पहले तट की ओर देखा। वह सुंदर और वीर राजपूत अभी भी वहाँ खड़ा था और नीलांबरदास को देखकर मंद-मंद मुस्करा रहा था।

अचानक वह राजपूत अंतर्धान हो गया, नीलांबरदास को विश्वास हो गया कि अवश्य ही ये मेरे जगन्नाथ भगवान् थे और मेरी रक्षा के लिए ही इस वेश में आए थे।

जगन्नाथ भगवान् की इस कृपा को स्मरण कर वे भाव-विभोर और रोमांचित हो उठे। रास्ते भर प्रेम के आँसू बहाते हुए वे जगन्नाथ पुरी पहुँचे।

वहाँ जगन्नाथ रथयात्रामें दूर-दूर से आए हुए लाखों भक्तों की भीड़ “जय जगन्नाथ” “जय बलभद्र” ” जय सुभद्रा” के जयघोष कर रही थी।

नीलांबरदास ने रथारूढ़ जगन्नाथ भगवान् के भाई बलभद्र और बहिन सुभद्रा सहित दर्शन किए और उन्हें नेत्र भर निहारा। फिर वे बेसुध होकर भगवान् के रथ के सामने साष्टांग प्रणाम करते हुए गिर पड़े।

भक्तों ने दौड़कर उन्हें उठाना चाहा, किंतु तब तक तो नीलांबरदास अपने इष्ट जगन्नाथ भगवान् से एक हो चुके थे। भक्तों ने जगन्नाथ भगवान् का कीर्तन करते हुए उनकी पार्थिव देह का समुद्र में विसर्जन किया।

:- आज भी जगन्नाथ धाम में भक्त नीलांबरदास द्वारा भगवान् के दर्शन करते-करते प्राण त्यागनेकी गाथा गाई जाती है।

    !! जय हो जय हो अनाथोंके नाथ प्रभु जगन्नाथ !!


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