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Saturday, 23 August 2025

महाभारत के श्रीकृष्ण और उनका रथ

 महाभारत के युद्ध में अर्जुन जब कौरवों के विरुद्ध लड़ने से विचलित हुए, तब उन्होंने अपने सारथी श्रीकृष्ण से कहा –

"मैं अपने बंधु-बांधवों पर शस्त्र कैसे उठाऊँ?" 

तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को धर्म और कर्तव्य का उपदेश दिया, जिसे हम आज श्रीमद्भगवद्गीता के नाम से जानते हैं। 

 युद्ध में श्रीकृष्ण ने स्वयं शस्त्र नहीं उठाया, केवल अर्जुन के रथ के सारथी बने।

लेकिन वह रथ साधारण नहीं था –

उसमें हनुमानजी ध्वज पर विराजमान थे,स्वयं कृष्ण सारथी थे,

और अर्जुन धनुष-बाण से युद्ध कर रहे थे।

युद्ध समाप्त होने के बाद, जैसे ही श्रीकृष्ण रथ से उतरे, वह दिव्य रथ तुरंत जलकर भस्म हो गया। 

अर्जुन आश्चर्यचकित हुए, तब कृष्ण मुस्कुराकर बोले –

"पार्थ! यह रथ पहले ही शस्त्रों की मार से नष्ट हो चुका था। मेरी उपस्थिति के कारण ही यह अब तक सुरक्षित रहा।"

 यह कथा सिखाती है कि जीवन का रथ तभी सुरक्षित रहता है जब उसमें सारथी स्वयं भगवान हों।

जब कृष्ण सारथी बनते हैं, तो युद्ध कितना भी कठिन क्यों न हो – विजय निश्चित है। 

#जयश्रीकृष्ण #पार्थसारथी #महाभारत #श्रीमद्भगवद्गीता #


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Monday, 13 January 2025

जानिए क्या है उत्तरायण-प्रति वर्ष मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण होता है

 क्या होता है सूर्य उत्तरायण

प्रति वर्ष मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण होता है, यानी दक्षिण से उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू होता है। इससे रातें छोटी व दिन बड़े होने लगते हैं। धर्म ग्रंथों में उत्तरायण को देवताओं का दिन भी कहते हैं।

क्या है उत्तरायण

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सूर्य 30-31 दिनों में राशि परिवर्तन करता है। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना गया है। मकर संक्रांति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध में होता है अर्थात् भारत से दूर (भारत उत्तरी गोलार्द्ध में है)। इस समय सूर्य दक्षिणायन होता है। इसी कारण यहां रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं व गर्मी का मौसम शुरू हो जाता है। इसे उत्तरायण कहते हैं।

शुभ होता है सूर्य का उत्तरायण होना.

धर्म ग्रंथों के अनुसार सूर्य एक सौर वर्ष (365 दिन) में क्रमानुसार 12 राशियों में भ्रमण करता है। जब सूर्य किसी राशि में प्रवेश करता है तो उसे संक्रांति कहते हैं। जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है तो मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। सूर्य का मकर राशि में जाना बहुत ही शुभ माना जाता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रांति से ही देवताओं का दिन शुरू होता है, जिसे उत्तरायण कहते हैं।

इसलिए उत्तरायण को कहते हैं देवताओं का दिन

धर्मग्रंथों में उत्तरायण को देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा गया है। शास्त्रों में उत्तरायण को सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए ये समय जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि के लिए विशेष है। मकर संक्रांति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। ऐसा जानकर संपूर्ण भारत में लोगों द्वारा विविध रूपों में सूर्यदेव की उपासना व पूजा कर, उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है।

सूर्य की गति से संबंधित होने के कारण यह पर्व हमारे जीवन में गति, नव चेतना, नव उत्साह और नव स्फूर्ति का प्रतीक है क्योंकि यही वो कारक है जिनसे हमें जीवन में सफलता मिलती है। उत्तरायण का महत्व इसी तथ्य से स्पष्ट होता है कि हमारे ऋषि-मुनियों ने इस अवसर को अत्यंत शुभ और पवित्र माना है। उपनिषदों में इस पर्व को ‘देव दान’ भी कहा गया है।

भीष्म ने किया था सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार..............

उत्तरायण को हिंदू धर्म में बहुत ही पवित्र समय माना गया है। महाभारत में भी कई बार उत्तरायण शब्द का उल्लेख आया है। सूर्य के उत्तरायण होने का महत्व इसी कथा से स्पष्ट है कि बाणों की शैया पर लेटे भीष्म पितामह अपनी मृत्यु को उस समय तक टालते रहे, जब तक कि सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण नहीं हो गया। सूर्य के उत्तरायण होने के बाद ही उन्होंने अपने प्राण त्यागे।

स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायण का महत्व बताते हुए गीता में कहा है कि जब सूर्यदेव उत्तरायण होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। इसके विपरीत सूर्य के दक्षिणायण होने पर पृथ्वी अंधकारमय होती है और इस अंधकार में शरीर त्याग करने पर पुनर्जन्म लेना पड़ता है


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Thursday, 7 November 2024

संत श्री जलाराम बापा का जीवन चरित्र जाने

 संत श्री जलाराम बापा जयंती 

➡ 08 नवम्बर 2024 शुक्रवार को संत श्री जलाराम बापा जयंती है ।

जलाराम बापा का जन्म सन्‌ 1799 में गुजरात के राजकोट जिले के वीरपुर गॉंव में हुआ था। उनके पिता का नाम प्रधान ठक्कर और मॉं का नाम राजबाई था। बापा की माँ एक धार्मिक महिला थी, जो साधु-सन्तों की बहुत सेवा करती थी। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर संत रघुवीर दास जी ने आशीर्वाद दिया कि उनका दुसरा प़ुत्र जलाराम ईश्वर तथा साधु-भक्ति और सेवा की मिसाल बनेगा।

 16 साल की उम्र में श्री जलाराम का विवाह वीरबाई से हुआ। परन्तु वे वैवाहिक बन्धन से दूर होकर सेवा कार्यो में लगना चाहते थे। जब श्री जलाराम ने तीर्थयात्राओं पर निकलने का निश्चय किया तो पत्नी वीरबाई ने भी बापा के कार्यो में अनुसरण करने में निश्चय दिखाया। 18 साल की उम्र में जलाराम बापा ने फतेहपूर के संत श्री भोजलराम को अपना गुरू स्वीकार किया। गुरू ने गुरूमाला और श्री राम नाम का मंत्र लेकर उन्हें सेवा कार्य में आगे बढ़ने के लिये कहा, तब जलाराम बापा ने ‘सदाव्रत’ नाम की भोजनशाला बनायी जहॉं 24 घंटे साधु-सन्त तथा जरूरतमंद लोगों को भोजन कराया जाता था। इस जगह से कोई भी बिना भोजन किये नही जा पाता था। वे और वीरबाई मॉं दिन-रात मेहनत करते थे।

बीस वर्ष के होते तक सरलता व भगवतप्रेम की ख्याति चारों तरफ फैल गयी। लोगों ने तरह-तरह से उनके धीरज या धैर्य, प्रेम प्रभु के प्रति अनन्य भक्ति की परीक्षा ली। जिन पर वे खरे उतरे। इससे लोगों के मन में संत जलाराम बापा के प्रति अगाध सम्मान उत्पन्न हो गया। उनके जीवन में उनके आशीर्वाद से कई चमत्कार लोगों ने देखें। जिनमे से प्रमुख बच्चों की बीमारी ठीक होना व निर्धन का सक्षमता प्राप्त कर लोगों की सेवा करना देखा गया। हिन्दु-मुसलमान सभी बापा से भोजन व आशीर्वाद पाते। एक बार तीन अरबी जवान वीरपुर में बापा के अनुरोध पर भोजन किये, भोजन के बाद जवानों को शर्मींदगी लगी, क्योंकि उन्होंने अपने बैग में मरे हुए पक्षी रखे थे। बापा के कहने पर जब उन्होंने बैग खोला, तो वे पक्षी फड़फड़ाकर उड़ गये, इतना ही नही बापा ने उन्हें आशीर्वाद देकर उनकी मनोकामना पूरी की। सेवा कार्यो के बारे में बापा कहते कि यह प्रभु की इच्छा है। यह प्रभु का कार्य है। प्रभु ने मुझे यह कार्य सौंपा है इसीलिये प्रभु देखते हैं कि हर व्यवस्था ठीक से हो सन्‌ 1934 में भयंकर अकाल के समय वीरबाई मॉं एवं बापा ने 24 घंटे लोगों को खिला-पिलाकर लोगों की सेवा की। सन्‌ 1935 में माँ ने एवं सन्‌ 1937 में बापा ने प्रार्थना करते हुए अपने नश्वर शरीर को त्याग दिया।

 आज भी जलाराम बापा की श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करने पर लोगों की समस्त इच्छायें पूर्ण हो जाती है। उनके अनुभव ‘पर्चा’ नाम से जलाराम ज्योति नाम की पत्रिका में छापी जाती है। श्रद्धालुजन गुरूवार को उपवास कर अथवा अन्नदान कर बापा को पूजते हैं।



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Thursday, 3 October 2024

महाभारत के युद्ध के बाद पांडवो के स्वर्गरोहान की कथा है कि पांडव जब द्रौपदी सहित सशरीर स्वर्ग जाने लगे

 धर्म ही मनुष्य का सच्चा साथी है

महाभारत के स्वर्गारोहणपर्व की कथा है कि पांडव जब द्रौपदी सहित सशरीर स्वर्ग जाने लगे, उस समय उनके साथ एक कुत्ता भी चल रहा था।

चलते-चलते सबसे पहले हिमालय की बर्फ में द्रौपदी गलकर गिरने लगी, तब भीम ने युधिष्ठिर से कहा कि हम लोगों की चिरसंगिनी द्रौपदी गिर रही है।

धर्मराज युधिष्ठिर ने पीछे देखे बिना ही कहा—’गिर जाने दो, उसका व्यवहार पक्षपातपूर्ण था; क्योंकि वह हम सबसे अधिक अर्जुन से प्रेम करती थी।’ ऐसा कहकर वे आगे चलते गए, पीछे देखा भी नहीं; क्योंकि धर्म के मार्ग पर चलने वाले को कभी पीछे नहीं देखना चाहिए।

थोड़ी दूर जाने पर सहदेव लड़खड़ाने लगे। यह देखकर भीम ने कहा–’दादा! प्रिय भाई सहदेव गिर रहे हैं। इन्होंने तो सदैव ही अभिमानरहित होकर हमारी सेवा की है; फिर ये क्यों गिर रहे हैं?’

युधिष्ठिर ने कहा–’भाई सहदेव को अपनी विद्वता (ज्ञान) का अभिमान था।’ ऐसा कहकर युधिष्ठिर बिना पीछे देखे शेष भाईयों के साथ आगे बढ़ते रहे।

इतने में नकुल को लड़खड़ाते देखकर भीम ने कहा–’भाई नकुल भी साथ छोड़ना चाहते हैं।’

युधिष्ठिर ने कहा–’उसे अपनी सुन्दरता का अभिमान था, इसलिए उसका पतन हुआ।’  ऐसा कहकर बिना पीछे देखे युधिष्ठिर आगे बढ़ने लगे।

तभी अर्जुन को गिरता देखकर भीम ने कहा–’दादा! श्वेत घोड़ों के रथ पर गाण्डीव धनुष धारण करके घूमने वाला अर्जुन गिर रहा है।’

युधिष्ठिर ने बिना पीछे देखे जवाब दिया–’गिर जाने दो, उसे अपनी शूरवीरता का बहुत अभिमान था।’

अंत में महाबली भीम भी लड़खड़ाकर गिरने लगे। उन्होंने युधिष्ठिर को पुकार कर कहा–’दादा! मैं भी गिरा जाता हूँ, मेरी रक्षा करो।’

युधिष्ठिर ने कहा–’तू तो बड़ा पेटू था और तुझे अपने बल का बड़ा घमण्ड था कि संसार में तेरे समान कोई बलशाली नहीं है; अत: तेरा पतन भी निश्चित है।’ इस प्रकार युधिष्ठिर बिना पीछे देखे आगे बढ़ते गए।

तभी युधिष्ठिर ने देखा कि जो कुत्ता शुरु में उन्हें मिला था, वह साथ आ रहा है। उसी समय युधिष्ठिर को इन्द्रदेव के दर्शन हुए।

इन्द्र ने कहा कि रथ पर सवार होकर सदेह इन्द्रलोक को चलिए। युधिष्ठिर ने कहा कि ‘ये कुत्ता हमारे साथ आया है; पहले इसे रथ पर चढ़ाइए, तब मैं रथ पर चढ़ूँगा।’

इन्द्र ने कहा कि स्वर्ग में कुत्ता नहीं जा सकता।

युधिष्ठिर ने कहा–’यदि कुत्ता नहीं जा सकता तो मैं भी नहीं जाऊंगा; क्योंकि यह हमारी शरण में आया है, अत: इसे छोड़कर मैं स्वर्ग में नहीं जाना चाहता।’ नियम है कि शरणागत की रक्षा न करने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति नहीं होती है—

सरनागत कहँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।

ते नर पाँवर पापमय तिन्हहिं बिलोकत हानि।।

(मानस, सुन्दरकाण्ड, ४३)

धर्मराज युधिष्ठिर ने इन्द्र से जब यह कहा तब धर्मदेव जिन्होंने कुत्ते का रूप धारण कर रखा था, साक्षात् उपस्थित हो गए और युधिष्ठिर से कहने लगे...

’मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ; तुमने अनेक कठिनाइयों को झेलते हुए भी धर्म का त्याग नहीं किया।’ इसके बाद देवराज इंद्र युधिष्ठिर को अपने रथ में बैठाकर स्वर्ग ले गए।

धर्मो रक्षति रक्षित:

अर्थात् धर्म की जो रक्षा करता है, उसकी धर्म रक्षा करता है। मृत्यु के समय क्लेश से तड़पते हुए जीव की रक्षा वे वस्तुएं नहीं कर सकतीं जिनको प्राप्त करने में वे कठिन परिश्रम करते और अनेक कष्ट सहते हैं।

अंत समय में केवल धर्म ही साथ देता है और वही साथ जाता है।

अत: जो लोक-परलोक में हमारी रक्षा करे, हमारा साथ दे, उस धर्म को ही सच्चा साथी बनाना चाहिए। इस प्रकार धर्म ही मनुष्य के लोक-परलोक का साथी है।

चलं चित्तं चलं वित्तं चले जीवन यौवने।

चलाचले हि संसारे धर्मं एको हि निश्चल:।।

अर्थात् : विद्वानों ने इस संसार (मन, धन, जीवन, यौवन) को चलायमान माना है, इस नाशवान संसार में केवल धर्म ही अचल है और मनुष्य का सच्चा साथी है।

धर्म है जीवन-पथ का लक्ष्य।

धर्म है सब सत्यों का सत्य।।

धर्म से मिटता तन-मन-ताप।

धर्म से मिल जाते प्रभु आप।।


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श्रवण कुमार की कथा

  श्रवण कुमार की कथा :-

कर्म ही हमारा वर्तमान और भविष्य है ,

जैसा करोगे वैसा ही भरोगे ,

राजा दशरथ जी के द्वारा किया गया कर्म का फल तो राम जी व उनके पूरे परिवार को भरना पड़ा जबकि राम जी तो भगवान के एक अंशरूप थे l

तो जब भगवान कर्म के फल से नहीं बचे तो हम सब लोग तो एक आम इंसान है l 

पिता के द्वारा किया गया कर्म का फल पुत्र को मिलता है और पिता के द्वारा किया गया कर्म का फल पुत्र को भरना भी पड़ता है l

इसे कहानी के माध्यम से समझते है :-

यह कहानी त्रेता युग की है। उस समय श्रवण कुमार नाम का एक बालक था। उसके माता-पिता अंधे थे और उन्होंने श्रवण को कई मुसीबतों का सामना करते हुए पाला था। श्रवण कुमार बचपन से ही अपने माता-पिता का बहुत आदर करता था। 

जैसे-जैसे श्रवण बड़ा होता गया, उसने घर की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली।

वह रोजाना सुबह उठकर सबसे पहले अपने माता-पिता को स्नान कराने के लिए तालाब से पानी भरकर लाता था। इसके बाद वह तुरंत जंगल की ओर लकड़ियां बीनने जाता। फिर लकड़ियां लाने के बाद श्रवण चूल्हा जलाकर माता-पिता के लिए खाना बनाता था।

श्रवण को इतनी मेहनत करते देख उसकी मां हमेशा उसे टोकती थी। वह कहती थी, “श्रवण बेटा तुम इतना सारा काम अकेले क्यों करते हो? खाना तुम मुझे बनाने दिया करो। मैं आसानी से बना लूंगी। इसके बदले तुम थोड़ा आराम कर लिया करो।”

मां की इन बातों को सुनकर श्रवण कुमार कहता, “नहीं मां, मैं ये सारे काम आप लोगों के लिए ही तो करता हूं। भला अपने मां-बाप के लिए किए गए कामों में कैसी थकान। उल्टा मुझे तो खुशी मिलती है।”

श्रवण कुमार की इन बातों को सुनकर उसकी मां भावुक हो गई। वो रोज भगवान से प्रार्थना करती, “हे प्रभु! इतना ध्यान रखने वाला श्रवण जैसा बेटा हर माता-पिता के घर पैदा हो।”

श्रवण के मां-बाप नियमित रूप से भगवान की आराधना करते थे। वह उनके लिए फूल और पूजा की अन्य सामग्री लाता। फिर खुद भी बिना देर किए माता-पिता के साथ पूजा में शामिल हो जाता था। श्रवण कुमार धीरे-धीरे बड़ा हुआ और जल्दी से घर के कार्यों को खत्म करके बाहर काम पर निकल जाता था।

एक दिन श्रवण अपने माता-पिता के साथ बैठा था, तभी उन्होंने श्रवण से कहा, “बेटा तुमने हमारी हर ख्वाहिश पूरा की है। अब हमारी केवल एक ही इच्छा है, जिसे हम पूरी करना चाहते हैं।

यह सुन श्रवण ने उनसे पूछा, “ऐसी कौन-सी इच्छा बाकी है, जिसे आप पूरा करना चाहते हैं। आप केवल आदेश दें। मैं आपकी हर ख्वाहिश को पूरा करूंगा।”

इस पर श्रवण के पिता ने कहा, “बेटा! अब हम बूढ़े हो चुके हैं और हम चाहते हैं कि मरने से पहले तीर्थ यात्रा के लिए जाएं। भगवान के शरण में जाकर हमें सुकून की प्राप्ति होगी।”

अपने मां-बाप की बात सुनकर श्रवण कुमार सोचने लग गया कि वह उनकी इस इच्छा को कैसे पूरा करेगा। उस समय बस और ट्रेन की सुविधा नहीं थी। साथ ही उसके माता-पिता देख भी नहीं सकते थे। ऐसे में उन्हें तीर्थ यात्रा कराना भला कैसे संभव हो पाता।

फिर श्रवण कुमार ने उस तराजू में अपने मां-बाप को बारी-बारी से गोद में उठाकर बैठा दिया।


उसके बाद तराजू को अपने कंधों पर लेकर उन्हें तीर्थ यात्रा पर लेकर निकल पड़ा। वह लगातार कुछ दिनों तक अपने माता-पिता को एक के बाद एक सभी पवित्र स्थलों पर घुमाने लगा। इस दौरान श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को प्रयाग से लेकर काशी तक के दर्शन कराए।

माता-पिता को घुमाते समय श्रवण कुमार उन्हें उन जगहों के बारे में भी बताते चलता था, क्योंकि वह आंखों से उस दृश्य को नहीं देख सकते थे। अपनी बेटे की मेहनत को देख उसके माता-पिता बहुत खुश थे।

उन्होंने एक दिन श्रवण से कहा, “बेटा, हम देख नहीं सकते, लेकिन कभी भी हमें इस बात का दुख नहीं हुआ। तुम हमारे लिए हमारी आंखें हो। तुमने हमें जिस तरह सारे पवित्र स्थानों की कथा सुनाकर उनके दर्शन कराए हैं, ऐसा लगता है जैसे कि हमने सच में प्रभु के दर्शन अपनी आंखों से किया हो।”

अपनी माता-पिता की बातें सुनकर श्रवण ने कहा, “आप लोग ऐसी बातें न करें। बच्चों के लिए माता-पिता कभी भी बोझ नहीं होते। यह तो बच्चों का धर्म होता है।” एक दिन श्रवण कुमार आराम करने के लिए अयोध्या के पास अपने माता-पिता के साथ रुका। तभी उसकी मां ने पानी पीने की इच्छा जताई। श्रवण को पास में ही एक नदी दिखाई दी। उसने अपने माता-पिता से कहा, “आप दोनों यहां आराम करें, मैं आप लोगों के लिए अभी पानी लेकर आता हूं।”

नदी के पास पहुंचकर श्रवण कुमार कमंडल में पानी भरने लगा। उसी जंगल में अयोध्या के राजा दशरथ भी शिकार के लिए पहुंचे थे। पानी में हलचल की आवाज सुनकर उन्हें लगा कि कोई जानवर पानी पीने आया है। उन्होंने बिना देखे केवल ध्वनि सुनकर ही अपना तीर चला दिया। दुर्भाग्य से वह सीधे श्रवण कुमार को लग गया। तीर लगते ही वह चीख पड़ा।

इसके बाद राजा दशरथ जब अपने शिकार को देखने पहुंचे, तो वहां श्रवण था। वो तुरंत श्रवण कुमार के नजदीक पहुंचे और कहा, “मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मुझे माफ कर दीजिए। मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि यहां कोई मानव होगा। मैं इस गलती का पश्चाताप करने के लिए क्या करूं कि तुम मुझे माफ कर दो।”

तभी करहाते हुए श्रवण कुमार ने कहा, “यहां से थोड़ी ही दूर जंगल में मेरे माता-पिता बैठे हैं। उन्हें काफी प्यास लगी है। आप उन तक यह पानी पहुंचा दीजिए और मेरे बारे में उन्हें कुछ भी न बताएं।” इतना कहते-कहते श्रवण कुमार की सांसें रुक गईं।

श्रवण कुमार की मौत से राजा दशरथ सुन्न पड़ गए। किसी तरह वो श्रवण कुमार के बताए अनुसार जल लेकर उसके माता-पिता के पास पहुंचे। श्रवण के माता-पिता अपने बेटे की आहट को बखूबी पहचानते थे। जब राजा दशरथ उनके करीब पहुंचे तो उन्होंने आश्चर्य से पूछा, “तुम कौन हो और हमारे श्रवण को क्या हुआ? वह क्यों नहीं आया?”

राजा दशरथ उनके सवालों का जवाब नहीं दे पाए। उन्होंने चुपचाप पानी उनकी तरफ बढ़ा दिया। तभी श्रवण की मां ने चिंतित स्वर में जोर से कहा, “तुम कौन हो और मेरा बेटा कहां है, ये बताते क्यों नहीं हो?’

श्रवण की मां की चिंता देखकर राजा दशरथ ने कहा, “मां मुझे माफ कर दीजिए। शिकार करने के लिए मैंने जो तीर चलाया था, वो सीधे आपके बेटे श्रवण को जा लगा। उसने मुझे आप लोगों के बारे में बताया, इसलिए मैं यहां पानी लेकर चला आया।” इतना कहकर राजा दशरथ चुप हो गए।

राजा दशरथ की बात सुनकर श्रवण की मां जोर-जोर से रोने लगी। उन दोनों ने अपने बेटे की मौत के गम में राजा दशरथ के लाए हुए पानी को हाथ तक नहीं लगाया। श्रवण के पिता ने तभी राजा दशरथ को पुत्र वियोग का श्राप दे दिया। कुछ ही देर बाद श्रवण के माता-पिता ने अपने प्राण त्याग दिए l

बताया जाता है कि श्रवण कुमार के पिता के श्राप के परिणामस्वरूप ही राजा दशरथ को अपने पुत्र राम से दूर रहने पड़ा था। 

राजा दशरथ के इस श्राप को पूरा करने के लिए ही भगवान राम को 14 वर्षों का वनवास हुआ, जिसका माध्यम दशरथ की पत्नी कैकेयी बनीं। श्रवण के पिता की ही तरह राजा दशरथ भी अपने बेटे से दूरी को बर्दाश्त नहीं कर पाए और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।

राजा दशरथ जी के द्वारा किया गया कर्म का फल तो राम जी व उनके पूरे परिवार को भरना पड़ा जबकि राम जी तो भगवान के एक अंशरूप थे l

तो जब भगवान कर्म के फल से नहीं बचे तो हम सब लोग तो एक आम इंसान है l 

कहानी से सीख– 

हर बच्चे को अपने माता-पिता की सेवा श्रवण कुमार की तरह ही निस्वार्थ भाव से करनी चाहिए। यही उनका सबसे बड़ा कर्तव्य है ll


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शितला माता मंदिर कडाधाम यहां गिरा था मां सती का हाथ जो सिरायु कौशांबी जिला उत्तर प्रदेश मे स्थित है

शितला माता मंदिर कडाधाम सिरायु कौशांबी जिला उत्तर प्रदेश 

कड़ा धाम: यहां गिरा था मां सती का हाथ , शीतला माता के दर्शन को हर साल पहुंचते हैं लाखों श्रद्धालु

 माता शितला को पूर्वाचल की अधिष्ठात्री देवी भी कहा जाता है।

उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में सिराथू के पास स्थित कड़ा धाम शीतला माता का मंदिर बहुत प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है । इक्यावन शक्तिपीठों में से एक मां शीतलाधाम में शीतलाधाम में हर वर्ष आषाढ़ महीने की सप्तमी-अष्टमी को विशेष मेला लगता है। सात दिवसीय इस मेले में पूर्वाचल के सभी जिलों के अलावा देश के विभिन्न प्रान्तों से श्रद्धालु मां के दर्शन पूजन के लिए आते हैं। इसके अलावा हर साल यहां लाखों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिये आते हैं । शक्तिपीठ मां शीतला देवी को पुत्र देने वाली देवी भी कहा जाता है। कहा जाता है कि जो भक्त मंदिर के शीतल कुंड को जल, दूध, फल व मेवे से भरवाता है उसे मनोवांछित फल मिलता है । नवरात्रि के अवसर पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है । माता शीतला को पूर्वांचल की अधिष्ठात्री देवी भी कहा जाता है।

 यहां गिरा था मां सती का हाथ

सैंकड़ों साल से शीतलाधाम कड़ापीठ शक्ति उपासकों का केन्द्र रहा है। पुराणों के अनुसार भगवान शिव की भार्या सती ने जब अपने पिता दक्ष के अपमान को सहन न कर पाने की स्थिति में यज्ञ कुण्ड में कूदकर प्राण त्याग दिया तो उनके वियोग से आक्रोशित भगवान शिव सती का शव लेकर सभी लोकों में भ्रमण करने लगे। उनके क्रोधित रूप को देखकर तीनों लोकों में हलचल मच गई। देव मनुष्य सभी प्राणी भयभीत हो गए। तब शिव के क्रोध से बचने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के मृत शरीर के 51 टुकड़े कर दिए। सती के शव के ये टुकड़े जहां भी गिरे वहीं एक शक्तिपीठ स्थापित कर दिया गया। कराकोटम जंगल में जिस स्थान पर सती का हाथ गिरा उस स्थान का नाम करा रख दिया गया जो बाद में अपभ्रंश होकर कड़ा हो गया। अब इसे कड़ा धाम के नाम से पूरे देश में जाना जाता है। 

 माना जाता है कि द्वापर युग में पाण्डु पुत्र युधिष्ठिर अपने वनवास समय में कड़ा धाम देवी दर्शन के लिए आए। यहां उन्होंने गंगा के किनारे शीतलादेवी का मंदिर बनवाया और महाकालेश्वर शिवलिंग की स्थापना की। वर्तमान में मां शीतला देवी का मंदिर भव्य स्वरूप ले चुका है। मंदिर में स्थित शीतला देवी की मूर्ति में माता गर्दभ पर बैठी हुई है। ऐसा माना जाता है कि चैत्र माह में कृष्णपक्ष के अष्टमी पर यदि देवी शीतला की पूजा की जाए तो बुरी शक्तियों से पीछा छुटाया जा सकता है। यह मंदिर 1000 ई. में बनाया गया था।

कैसे पहुंचे

कड़ा धाम शीतला माता का मंदिर रेल मार्ग से जुड़ा है। सिराथू यहां का मुख्य रेलवे स्टेशन है, जहां से मंदिर की दूरी 10 किलोमीटर है। इसके अलावा यूपी के कई शहरों से बस से सीधे यहां पहुंच सकते हैं। बस से सैनी पहुंचना होता है, जहां से मंदिर की दूरी 8 किलोमीटर है। रेलवे स्टेशन और सैनी से टैक्सी या ऑटो लेकर वहां पहुंचा जा सकता है। प्रयागराज यहां का नजदीकी हवाई अड्डा है जो देश के कई शहरों से कनेक्ट है । प्रयागराज से यहां की दूरी करीब 70 किलोमीटर है

शीतलामाता मंदिर कड़ा धाम







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Wednesday, 2 October 2024

लालमती दुरमारी गणेश मंदिर जो अभयपुरी बोंगाईगांव, असम राज्य मे स्थित हैं

लालमती दुरामरी गणेश मंदिर असम के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। इसकी संरचना और नक्काशीदार मूर्तियाँ, मंदिर, इसकी चित्रकारी 8वीं से 10वीं शताब्दी की हैं*

लालमती दुरामरी गणेश मंदिर असम के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। यह बोंगाईगांव के पास खगरापार पहाड़ियों पर अभयपुरी के पास स्थित है। प्रतिमाओं की ऐतिहासिकता का अभी पता लगाया जाना बाकी है।

लेकिन पुरातत्वविदों के अध्ययन के अनुसार, यह निष्कर्ष निकाला गया है कि संरचना और नक्काशीदार मूर्तियाँ, मंदिर और इसकी पेंटिंग 8वीं से 10वीं शताब्दी ईस्वी की हैं। यदि आप इस स्थान पर जाते हैं, तो आपको इन स्मारकों के अवशेष और खंडहर दिखाई देंगे।

स्मारक के टूटे हुए हिस्से सुंदर अमूर्त आकृतियों में लटके हुए हैं, और इस कारण यह स्मारक दूसरों से और भी अलग और अनोखा है। पुरातत्वविदों के अनुसार, भूकंप इसके विनाश का कारण था।

लालमती दुरामारी मंदिर प्रकृति प्रेमियों के लिए एक अच्छा स्थान है क्योंकि यह स्थान शांत और सुंदर है, तथा उन लोगों के लिए भी जो इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखते हैं।

नवंबर से फरवरी तक का समय यहां आने के लिए सबसे अच्छा है, ये महीने पर्यटकों के लिए सबसे अच्छा समय होता है।




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Thursday, 26 September 2024

श्रीकृष्ण की विभिन्न बांसुरिया के बारे मे जानिए

‘श्रीकृष्ण’ शब्द का अर्थ है ‘सबको अपनी ओर आकर्षित करने वाला।’ श्रीकृष्ण बाँसुरी की दिव्य मधुर ध्वनि से समस्त जीवों को अपनी ओर आकर्षित करके बुलाते हैं– ’तुम यहां आओ! मैं ही सच्चा आनन्द हूँ।’  

यह वंशी-ध्वनि नादब्रह्म या शब्दब्रह्म है; अत: जिस किसी के कानों का स्पर्श कर लेती है, वह श्रीकृष्णप्रेमरूपी परमानन्द में डूब जाता है।

कन्हैया जब अपने दाहिने कन्धे की ओर दाहिना गाल झुकाकर बाँसुरी बजाते हैं, तब गोपियां और गौएं बाबली हो जातीं। 

जब वे नजर ऊपर कर बाँसुरी बजाते, तब स्वर्ग के देवता, इन्द्र, चन्द्र, वरुण आदि तन्मय हो जाते; जब वे पृथ्वी की ओर नजर कर बाँसुरी बजाते हैं, तब पाताल की नागकन्याओं का मन भी डोलने लगता है। उस समय समस्त प्रकृति में हलचल मच जाती है।

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा धारण की जाने वाली विभिन्न बाँसुरियां..

भगवान श्रीकृष्ण अलग-अलग समय विभिन्न प्रकार की बाँसुरियों को धारण करते हैं..

गौचारण के समय श्रीकृष्ण धारण करते हैं ‘आनन्दिनी’ बांसुरी'

आनन्दिनी बांसुरी बांस की बनी होती है। इस बांसुरी के छिद्रों व मुखरन्ध्र (मुख से बजाये जाने वाले छिद्र) में चौदह अंगुल की दूरी होती है।

जब श्रीकृष्ण गायों के न्योने (दुहते समय गाय के पैर बांधने की रस्सी) की पगड़ी बाँध लेते और उनको फंसाने के फंदे (भागने वाली गायों को पकड़ने की रस्सी) को गले में डाल लेते हैं और गौओं को साथ लेकर मधुर-मधुर स्वर से बाँसुरी बजाते हुए चलते हैं, तब वे ‘आनन्दिनी’ नामक बांसुरी धारण करते हैं। यह बाँसुरी श्रीकृष्ण और उनके सखाओं को बहुत प्रिय है।

आनन्दिनी वंशी-ध्वनि को सुनकर भावावेश के कारण हजारों गायें और बछड़े श्रीकृष्ण को घेरे चुपचाप खड़े हो जाते। उनकी आंखों से आंसू बहने लगते तथा कान खड़े हो जाते। प्रत्येक गाय के सामने श्रीकृष्ण का मुख है। 

मानो भगवान के मुख की ओर आंख लगाए ये गौएं उनके रूप-सौंदर्य को अपने हृदय में उतारना चाहती हैं, इसलिए उन्होंने आंखों पर आंसुओं का परदा डाल दिया है। 

गायों की जैसी ही दशा उनके बछड़ों की भी है। दूध पी रहे बछड़े अपना मुंह ऊपर करके दोनों कानों का ‘दोना’ (पानपात्र) बनाकर अमृतरूपी वेणुनाद को पीने लगते हैं, ताकि वंशीनाद रूपी अमृत की एक भी बूंद कहीं पृथ्वी पर गिर न पड़े। 

ये भगवान की आनन्दिनी वंशी का कमाल है कि गाय और बछड़ों को अपनी देह की भी सुध नहीं रहती है।

रास के समय श्रीकृष्ण धारण करते हैं ‘महानन्दा’ बाँसुरी..

यह सोने की बनी बाँसुरी होती है। इस बाँसुरी में नौ छेद होते हैं। यह सत्रह अंगुल लम्बी होती है व छिद्रों व मुखरन्ध्र के बीच की दूरी दस अंगुल होती है।

शरदपूर्णिमा की रात्रि में रास के समय श्रीकृष्ण ‘महानन्दा’ नामक बाँसुरी धारण करते है। इसे ‘सम्मोहिनी’, ‘भुवनमोहिनी’ या ‘महानन्दा’ बाँसुरी भी कहते है।

महानन्दा बाँसुरी ‘सम्मोहिनी’ या ‘भुवनमोहिनी’ क्यों कही जाती है?

इसका कारण यह है कि इस बाँसुरी के स्वरों के सम्मोहन से चर और अचर दोनों की गति उलटी हो गई। 

चल (चलने-फिरने वाले) प्राणी प्रेममुग्धता के कारण अचल (निश्चेष्ट)  हो जाते हैं और अचल (स्थिर पदार्थ) चल (द्रवित) हो जाते हैं। 

शरदपूर्णिमा की रात्रि में जब भगवान ने वेणुनाद किया तो पवन की गति बंद हो गयी, यमुनाजल प्रवाहित होना बंद हो गया। पशु-पक्षी, मछलियां सभी उस स्वर के वश में हो गए। हिरण दौड़ना भूल गए। वृक्ष और लता आनन्द से पुलकित हो गए और पुष्प नये-नये रंग में खिल उठे।

बाँसुरी बजाई आछे रंग सौं मुरारी।

सुनि कैं धुनि छूटि गई संकर की तारी।।

वेद पढ़न भूलि गए ब्रह्मा ब्रह्मचारी।

रसना गुन कहि न सकै, ऐसि सुधि बिसारी।।

इंद्र सभा थकित भई, लगी जब करारी।

रंभा कौ मान मिट्यौ, भूली नृतकारी।।

जमुना जू थकित भईं, नहीं सुधि सँभारी।

सूरदास मुरली है तीन लोक प्यारी।।

रास के समय इस वेणु के मादक स्वरों के बन्धन में बंधकर स्वयं विधाता वेदपाठ करना भूल गए। शंकरजी का ध्यान टूट गया। वाणी (सरस्वती) अपनी ऐसी सुधि भूली कि वे वेणुनाद का गुणगान ही नहीं कर पा रही है। 

स्वयं पृथ्वी को धारण करने वाले शेषनाग (बलरामजी) पृथ्वी पर चलने लगे। देवताओं के विमान उसे सुनकर स्तब्ध रह गए और देवांगनाएं चित्रलिखी-सी रह गईं। 

स्वर्ग के संगीत-सम्राट गायक तुम्बरु की दशा विचित्र हो गई। वह आश्चर्यचकित होकर विस्फारित नेत्रों से वृन्दावन की ओर झांककर इसके बारे में जानना चाहता था। 

ग्रह-नक्षत्र अपनी राशि नहीं छोड़ रहे थे (चल नहीं पा रहे थे) क्योंकि उनके वाहन वंशी-ध्वनि के फंदे में बँध गए थे। चन्द्रमा अपना मार्ग भूल गए। शुक-सनकादि सभी मुनि मोहित हो गए। 


गन्धर्व, किन्नर आदि–सभी विमुग्ध हो आकाश से पृथ्वी की ओर देखने लगे। नारद का ध्यान टूट गया, इन्द्र की सभा स्तब्ध रह गयी। नृत्यकला भूल जाने से रम्भा का गर्व नष्ट हो गया

गोपियां आपस में बात करतीं हैं–’हे कृष्ण! तुम्हारी भुवनमोहिनी मुरली के स्वर में कितनी मादकता है; यह नशा शरीर-मन पर ऐसा छा जाता है कि फिर जीवन भर वह कभी उतरता ही नहीं।’

‘आकर्षिणी’ बांसुरी

जब बाँसुरी सोने से बनी हो, उसमें नौ छिद्र हों व छिद्रों व मुखरन्ध्र के बीच की दूरी बारह अंगुल हो तो उसे ‘आकर्षिणी’ बांसुरी कहते हैं।

हीरे, पद्मराग आदि मणियों से जटित श्रीकृष्ण की ‘वंशिका’..

ये बांसुरी मणियों से बनी होती है। इसमें आठ छिद्र होते हैं। जब बांसुरी का ऊपरी भाग चार अंगुल का व नीचे का भाग तीन अंगुल का होता है तो उसको ‘वंशिका’ या ‘वंशी’ कहते हैं। 

माता यशोदा अपने कन्हैया का श्रृंगार कर इसी बाँसुरी को कमरबंद में लगाती हैं।

‘मदन-झंकार’ बांसुरी..

कामदेव के चित्त को भी ललचा देने वाली भगवान श्रीकृष्ण की यह बांसुरी ‘मदन-झंकार’ कहलाती है। इसमें छह छिद्र होते हैं।

ब्रह्मा आदि देवताओं को जीत लेने के बाद कामदेव अत्यन्त अभिमानी हो गया था। उसने उन सबके सामने भगवान श्रीकृष्ण से युद्ध करने का निश्चय किया। भगवान ने उसका निमन्त्रण स्वीकार कर लिया। 

रास के समय कामदेव जब अपने दल-बल सहित आया तो भगवान का परम सुन्दर रूप-लावण्य देखकर व ‘मदन-झंकार’ बाँसुरी के उन्मद नाद से धूल में मिल गया। 

रासलीला भगवान की ‘कामजय-लीला’ है इसीलिए श्रीकृष्ण को ‘साक्षान्मन्मथमन्मथ’ अर्थात मन्मथ को भी मथ देने वाले कहते हैं।

मुरली ध्वनि कामबीज है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने आनन्द को ही वंशी-ध्वनि द्वारा व्रज के लोगों में वितरित किया और संसार का मोह छुड़ाकर इस वंशी-ध्वनि ने सारे कामियों को विशुद्ध प्रेमी बना दिया था।


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दिनांक 28.09.2024 दिन शनिवार को आने वाली है इन्दिरा एकादशी की कथा के बारे मे जानिए

   दिनांक 28.09.2024 दिन शनिवार को आने वाली है संवत् २०८१ के आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी :-👇

                            "इन्दिरा एकादशी"

          आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी इन्दिरा एकादशी कहलाती है। जब कभी श्राद्ध, श्रद्धा से न करके दबाव से किया जाता है या अयोग्य व्यक्ति के द्वारा श्राद्ध होता है तो श्राद्ध के बावजूद भी मुक्ति नहीं होती है। इस व्रत के प्रभाव से बड़े-बड़े पापों का नाश होता है। ऐसे में इंदिरा एकादशी का व्रत रखने से पितरों को सद्गति प्राप्त होती है। यह भटकते हुए पितरों की गति सुधारने वाला व्रत है। इस दिन भगवान विष्णु के प्रतीक शालिग्राम जी की उपासना की जाती है। व्रती को शालिग्राम जी को तुलसी पत्र यानि तुलसी का पत्ता अवश्य चढ़ाना चाहिए। शास्त्रों और वैष्णवों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि एकादशी भगवान विष्णु को बहुत प्रिय है। एकादशी का व्रत करने से विष्णु शीघ्र ही प्रसन्न होते है। इस साल यह व्रत 28 सितम्बर शनिवार को है। एकादशी व्रत की विधि यह व्रत दशमी अर्थात एकादशी से एक रात पहले आरम्भ हो जाता है। 

         दशमी की रात को भोजन नहीं किया जाता है। फिर एकादशी के पूरा दिन अन्न नहीं खाना चाहिए। व्रत को निराहार या फलाहार लेकर करें। ‘श्रीजी की चरण सेवा’ की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को फॉलो तथा लाईक करें और अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें। नोट–अब आप हमारा व्हाट्सएप चैनल भी ज्वॉइन कर सकते हैं। चैनल का लिंक हमारी फेसबुक पर देखें। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कर व्यक्ति को पूर्णरुप से स्वच्छ हो जाना चाहिए। सूर्यदेव को अर्घ्य दें। 

         उसके बाद भगवान विष्णु के विग्रह के समक्ष घी का दीप प्रज्जवलित करें। ईश्वर का ध्यान लगाकर भजन, चालीसा और आरती कर पूजा करें। एकादशी के व्रत का पारण एकादशी के अगले दिन सुबह किया जाता है। लेकिन व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि में पारण न किया जाए तो व्रत का फल व्रती को प्राप्त नहीं होता है। 

          एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति को वैष्णव धर्म का पालन करना चाहिए। इस दिन व्रती को नामजप अवश्य करना चाहिए। गाय को हरा चारा खिलाएँ। भगवान विष्णु के समक्ष गीता का पाठ करना विशेष फलदायी होता है। काँसे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए। व्रती को अधिकांश समय भजन और प्रभु स्मरण में बिताना चाहिए। सार्वजनिक स्थान पर पीपल का पौधा लगाएँ। इस दिन विशेषतौर पर चावल नहीं खाने चाहिए। रात्रि में जागरण करना चाहिए। उपवास करने वाले व्यक्ति को प्याज, बैंगन, पान-सुपारी, लहसुन व मांस-मदिरा आदि नहीं खाने चाहिए। 

                         इन्दिरा एकादशी की कथा 

          महिष्मतीपुरी के एक राजा थे इन्द्रसेन। धर्मपूर्वक प्रजा के उद्धार के लिए कार्य करते थे साथ ही हरि भक्त भी थे। एक दिन देवर्षि नारद उनके दरबार में आए। राजा ने बहुत प्रसन्न हो उनकी सेवा की और आने का कारण पूछा। देवर्षि ने बताया कि मैं यम से मिलने यमलोक गया, वहाँ मैंने तुम्हारे पिता को देखा। उन्होंने बताया कि व्रतभंग होने के दोष से वो यमलोक की यातनाएं झेलने को मजबूर है। इसलिए उन्होंने तुम्हारे लिए यह संदेश भेजा है कि तुम उनके लिए इन्दिरा एकादशी का व्रत करो। ताकि वो स्वर्गलोक को प्राप्त कर सकें। राजा ने पूछा- कृपा करके इन्दिरा एकादशी के संदर्भ में बताएँ। देवर्षि ने बताया कि आश्विन मास की यह एकादशी पितरों को सद्गति देने वाली है। एकादशी के दिन इस मंत्र का उच्चारण करें- 

            अद्य स्थित्वा निराहारः  सर्वभोगविवर्जितः। 

            श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥

          व्रत में अपना पूरा दिन नियम-संयम के साथ बिताएँ। व्रती को इस दिन आलस्य त्याग कर भजन करना चाहिए। पितरों का भोजन निकाल कर गाय को खिलाएँ। फिर भाई-बन्धु, नाती और पु्त्र आदि को खिलाकर स्वयं भी मौन धारण कर भोजन करना। इस विधि से व्रत करने से आपके पिता की सद्गति होगी। राजा ने इसी प्रकार इन्दिरा एकादशी का व्रत किया। व्रत के फल से राजा के पिता को हमेशा के लिए बैकुण्ठ धाम का वास मिला और राजा भी मृत्योपरांत स्वर्गलोक गए।   


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Wednesday, 25 September 2024

महाभारत में कर्ण और श्री कृष्ण का रोचक वार्तालाप जानिए

 महाभारत में कर्ण ने श्री कृष्ण से पूछा " मेरी माँ ने मुझे जन्मते ही त्याग दिया ,क्या ये मेरा अपराध था की मैंने मेरी माँ की कोख से एक अवैध बच्चे के रूप में जन्म लिया?

दोर्णाचार्य ने मुझे शिक्षा देने से इनकार कर दिया क्योंकी वो मुझे क्षत्रिय नही मानते थे, क्या ये मेरा कसूर था?

परशुराम जी ने मुझे शिक्षा दी किन्तु ये श्राप भी दिया कि मैं अपनी विद्या भूल जाऊंगा क्योंकी वो मुझे क्षत्रिय समझते थे?

भूलवश एक गौ मेरे तीर के रास्ते मे आकर मर गयी और मुझे गौ वध का श्राप मिला?

द्रोपदी के स्वयंबर में मुझे अपमानित किया गया क्योंकि मुझे किसी राजघराने का कुलीन व्यक्ति नही समझा गया?

यहाँ तक कि मेरी माता कुंती ने भी मुझे अपना पुत्र होने का सच अपने दूसरे पुत्रों की रक्षा के लिए स्वीकारा।

मुझे जो कुछ मिला दुर्योधन की दया स्वरूप मिला!

तो क्या ये गलत है की मैं दुर्योधन के प्रति अपनी वफादारी रखता हूँ?

श्री कृष्ण मंद मंद मुस्कुराते हुए बोले:

कर्ण ,मेरा जन्म जेल में हुआ था!

मेरा पैदा होने से पहले मेरी मृत्यु मेरा इंतज़ार कर रही थी!

जिस रात मेरा जन्म हुआ उसी रात मुझे मेरे माता पिता से अलग होना पड़ा!

मेरा बचपन रथों की धमक,घोड़ों की हिनहिनाहट तीर कमानों के साये में गुज़रा!

मैन गायों को चराया व उनके गोबर को उठाया!

जब मैं चल भी नही पाता था तो मेरे ऊपर प्राणघातक हमले हुए!

कोई सेना नही,कोई शिक्षा नही,कोई गुरुकुल नही,कोई महल नही, मेरे मामा ने मुझे अपना सबसे बड़ा शत्रु समझा!

जब तुम सब अपने वीरता के लिए अपने गुरु व समाज के लिए प्रशंसा पाते थे उस समय मेरे पास शिक्षा भी नही थी। 16 वर्ष की उम्र में मुझे ऋषि सांदीपनि के आश्रम में जाने का अवसर मिला!

तुम्हे अपनी पसंद के जीवनसाथी से विवाह का अवसर मिलता है और मुझे वो भी नही मिली जो मेरी आत्मा में बसती थी!

मुझे बहुत से विवाह राजनैतिक कारणों से या उन स्त्रियों से करने पड़े जिन्हें मैंने राक्षसों से छुड़ाया था!

मुझे जरासंध के प्रकोप के कारण मेरा सारा कुटुम्ब यमुना से ले जाकर सुदूर प्रान्त मे समुद्र के किनारे बसाना पड़ा!दुनिया ने मुझे कायर कहा!

यदि दुर्योधन युद्ध जीत जाता तो विजय का श्रेय तुम्हे भी मिलता, लेकिन धर्मराज के युद्ध जीतने का श्रेय अर्जुन को मिला! मुझे कौरवों ने अपनी हार का उत्तरदायी समझ!

हे कर्ण!किसी का भी जीवन चुनोतियों रहित नही है,सबके जीवन मे सब कुछ ठीक नही होता!कुछ कमियाँ अगर दुर्योधन में थी तो कुछ युधिष्टर में भी थी!

सत्य क्या है और उचित क्या है? ये हम अपनी आत्मा की आवाज़ द्वारा स्वयं निर्धारित करते हैं!

इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कितनी बार हम पर अन्याय होता है, इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कितनी बार हमारा अपमान किया जाता है,इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कितनी बार हमारे अधिकारों का हनन होता है...

फ़र्क़ सिर्फ इस बात से पड़ता है कि हम उन सबका सामना किस प्रकार करते हैं!

जीवन मे यदि हमारे साथ कुछ गलत होता है तो उससे हमे कुछ गलत करने का अधिकार नही मिल जाता,किन्ही एक परिस्थतियों के लिए हम किन्ही दूसरी परिस्थितियों को ज़िम्मेदार नही ठहरा सकते।

जीवन के संघर्षपूर्ण दौर ही हमारी किस्मत तय करते है।

ईश्वर ने हमे दिमाग दिया है लेकिन उसे गलत या सही रूप में इस्तेमाल करने का जिम्मा हमारा है!

ईश्वर ने हमे दो हाथ दिए उनसे धरती से उगता सोना खोदना है या किसी की कब्र ये निर्णय हमारा है!

ईश्वर ने हमे पैर दिये लेकिन उन्हें किस रास्ते पर चलना है ये निर्णय भी हमारा है!

संघर्ष तो दोनों और है लेकिन आप उसका कृष्ण की तरह सामना करते हैं या कर्ण की तरह !!

ये निर्णय हमारा है.

सब समझ गए न।


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Saturday, 21 September 2024

भक्त नीलांबरदास और भगवान जगन्नाथ की कथा

 भगवान् जगन्नाथ के भक्त नीलांबरदास रहते तो उत्तर प्रदेश में थे, किंतु उनका हृदय उड़ीसा के जगन्नाथ भगवान् ने चुरा लिया था।

एक दिन धन-संपत्ति, स्त्री-पुत्र सब को ठोकर मार जगन्नाथ भगवान् के दर्शन के लिए निकल पड़े। चलते-चलते गंगा तट पर पहुँचे, एक मल्लाह बीच गंगा में नौका पर बैठा मछली पकड़ रहा था।

नीलांबरदास ने उसे पुकारा और बोले- भाई! मुझे गंगा पार करा दो, भाड़े की चिंता न करना। मल्लाह लालची था, उसने सोचा यात्री के पास काफी धन है, वह नौका किनारे ले आया।

नीलांबरदास भगवान् जगन्नाथ के नाम का स्मरण करते हुए नौका में बैठ गए। गंगा की बहती धारा में नौका चल पड़ी।

सूर्यदेव अस्त हो चुके थे चारों ओर अंधकार फैलता जा रहा था। मल्लाह नौका को दूसरे तट पर ले जाने के स्थान पर गंगा की उफनती हुई धारा में बहाता ले जा रहा था।

उसने सोचा कि उफनती गंगा के बीच में नीलांबरदास को मारकर फेंक दिया जाए और उनका धन लूट लिया जाए।

जब उसने नीलांबरदास की बात नहीं सुनी, तो उन्हें मल्लाह पर संदेह हुआ और बोले- “भाई! क्या तू मुझे मारना चाहता है ? अच्छा, मैं भी देखता हूँ कि जगन्नाथपुरी के यात्री को कोई कैसे मार सकता है ?

मल्लाह क्रूर अट्टहास करते हुए बोला- मेरी नियत समझने में अब तुम्हें अधिक देर नहीं लगेगी। मैं तुम्हें अभी एक क्षण में ही जगन्नाथ धाम पहुँचाए देता हूँ। तुम्हें जिस-जिसको भी याद करना है, उसे याद कर लो।

नीलांबरदास घबराकर नेत्र मूंदकर मन-ही-मन भगवान् जगन्नाथ को पुकारने लगे : हे भगवन्! एक बार रथ पर आरूढ़ आप जगन्नाथ भगवान् के भाई बलभद्र और बहिन सुभद्रा सहित दर्शन करनेकी अभिलाषा है, फिर चाहे प्राण भले ही चले जाएँ।

हे जगन्नाथ! कृपया इस समय मुझे इस विपत्ति से बचाइए। मल्लाह के होठों पर अभी भी कुटिल मुस्कान नाच रही थी। अचानक पहले तट से एक कड़कती हुई आवाज गूँजी।

मल्लाह और नीलांबरदास ने मुड़कर देखा कि वहाँ एक अत्यंत सुंदर राजपूत युवक धनुष-बाण धारण किए खड़ा है। उसने मल्लाह को डांटते हुए कहा- अरे ओ मल्लाह! तुझे मरने की इच्छा न हो तो नाव झटपट किनारे ले आ।

धनुष-बाणधारी राजपूत को देखकर मल्लाह थर-थर काँपने लगा। उनकी कड़कती आवाज सुनकर उसकी तो जैसे नानी मर गई। किंतु फिर भी वह दुष्ट गंगा की धारा में नौका बहाता रहा।

जब राजपूत द्वारा दूसरी बार चेतावनी देने पर भी उसने उन्हें अनसुना करने की कोशिश की, तो राजपूत ने अपने धनुष पर एक बाण चढ़ाकर छोड़ा, सर्र से बाण आकर नौका में घुस गया।

किनारे से राजपूत का कड़कता स्वर गूँजा- अभी तो नौका पर बाण मारा है, यदि अब भी तट पर नौका नहीं लाया, तो अबकी बार तेरा सिर उड़ा दूँगा।

मल्लाह का चेहरा भय से फीका पड़ गया और उसने नौका तट की ओर वापस मोड़ ली। तट पर पहुँचने पर राजपूत ने मल्लाह को डांटते हुए बोले- इन ब्राह्मण को मेरे सामने ही तुरंत उस पार उतार।

यदि इन्हें कहीं ओर ले गया तो मेरे बाण का ध्यान रखना। मल्लाह ने राजपूत से अपने अपराध की क्षमा माँगी। फिर उस राजपूत युवक ने नीलांबरदास से बड़े प्रेम से कहा- मैंने यह वेश लुटेरों, हत्यारों से पीड़ित यात्रियों की रक्षाके लिए ही धारण किया है।

नीलांबरदास उसके रूप को देखकर मंत्रमुग्ध हो गए और उन्हें निहारते ही रह गए, वे मुख से कुछ भी बोल न सके। मल्लाह ने नीलांबरदास को तुरंत दूसरे तट पर उतार दिया।

राजपूत के रूप सौंदर्य को देखकर मल्लाह का हृदय परिवर्तन हो चुका था और पश्चाताप करते हुए वह नीलांबरदासके पैरों में गिर पड़ा।

नीलांबरदास ने उसे आशीर्वाद दिया और नजर उठाकर पहले तट की ओर देखा। वह सुंदर और वीर राजपूत अभी भी वहाँ खड़ा था और नीलांबरदास को देखकर मंद-मंद मुस्करा रहा था।

अचानक वह राजपूत अंतर्धान हो गया, नीलांबरदास को विश्वास हो गया कि अवश्य ही ये मेरे जगन्नाथ भगवान् थे और मेरी रक्षा के लिए ही इस वेश में आए थे।

जगन्नाथ भगवान् की इस कृपा को स्मरण कर वे भाव-विभोर और रोमांचित हो उठे। रास्ते भर प्रेम के आँसू बहाते हुए वे जगन्नाथ पुरी पहुँचे।

वहाँ जगन्नाथ रथयात्रामें दूर-दूर से आए हुए लाखों भक्तों की भीड़ “जय जगन्नाथ” “जय बलभद्र” ” जय सुभद्रा” के जयघोष कर रही थी।

नीलांबरदास ने रथारूढ़ जगन्नाथ भगवान् के भाई बलभद्र और बहिन सुभद्रा सहित दर्शन किए और उन्हें नेत्र भर निहारा। फिर वे बेसुध होकर भगवान् के रथ के सामने साष्टांग प्रणाम करते हुए गिर पड़े।

भक्तों ने दौड़कर उन्हें उठाना चाहा, किंतु तब तक तो नीलांबरदास अपने इष्ट जगन्नाथ भगवान् से एक हो चुके थे। भक्तों ने जगन्नाथ भगवान् का कीर्तन करते हुए उनकी पार्थिव देह का समुद्र में विसर्जन किया।

:- आज भी जगन्नाथ धाम में भक्त नीलांबरदास द्वारा भगवान् के दर्शन करते-करते प्राण त्यागनेकी गाथा गाई जाती है।

    !! जय हो जय हो अनाथोंके नाथ प्रभु जगन्नाथ !!


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