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Sunday, 5 October 2025

शरद पूर्णिमा 2025: महत्व, कथा, पूजा विधि और वैज्ञानिक रहस्य

 शरद पूर्णिमा 2025 भूमिका

भारत त्योहारों का देश है — यहाँ हर पर्व किसी न किसी धार्मिक, सामाजिक और वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है।

ऐसा ही एक पावन पर्व है शरद पूर्णिमा, जिसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।

यह दिन वर्ष की सबसे सुंदर पूर्णिमा मानी जाती है, जब चाँद अपनी सोलह कलाओं के साथ पूरे तेज से धरती पर चमकता है।

 शरद पूर्णिमा कब मनाई जाती है?

शरद पूर्णिमा हर वर्ष आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है।

साल 2025 में शरद पूर्णिमा 6 अक्टूबर (सोमवार) के दिन पड़ रही है।

यह तिथि अत्यंत शुभ मानी जाती है क्योंकि इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है, और उसकी किरणें औषधीय प्रभाव लेकर आती हैं।

शरद पूर्णिमा का धार्मिक महत्व

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ रासलीला की थी।

इस कारण इसे रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

कहा जाता है कि उस दिव्य रात में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने चंद्रमा की रोशनी में भक्ति और प्रेम का अद्भुत संगम रचा था।

इसी दिन माँ लक्ष्मी भी ब्रह्मांड में भ्रमण करती हैं और यह देखने आती हैं कि कौन जाग रहा है और उनकी उपासना कर रहा है।


इसलिए इस पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा कहा जाता है — जिसका अर्थ है “कौन जाग रहा है?”

जो व्यक्ति इस रात जागकर माँ लक्ष्मी और भगवान विष्णु की पूजा करता है, उसे वर्षभर सुख, शांति, समृद्धि और धन की प्राप्ति होती है।

शरद पूर्णिमा और खीर का महत्व

इस दिन दूध और खीर का विशेष महत्व होता है।

रात को खीर बनाकर खुले आसमान में चाँद की रोशनी में रखी जाती है।

कहते हैं कि इस रात की चंद्र किरणों में विशेष औषधीय गुण होते हैं, जो शरीर को ठंडक और मन को शांति देते हैं।

सुबह उस खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

इसे खाने से शरीर में नई ऊर्जा और रोगों से सुरक्षा मानी जाती है।

 शरद पूर्णिमा की पूजा विधि

यदि आप शरद पूर्णिमा की पूजा करना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए सरल चरणों का पालन करें:

1. सबसे पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें।

2.  घर के उत्तर या पूर्व दिशा में भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित करें।

3.  धूप, दीप, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें।

4.  खीर बनाकर चाँद की रोशनी में रखें।

5.  रात 12 बजे के बाद चंद्रमा को अर्घ्य दें।

6.  अगले दिन उस खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण करें।

 शरद पूर्णिमा की पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार राजा चन्द्रसेन की रानी लक्ष्मी की आराधना में लीन थीं।

रात्रि में माँ लक्ष्मी प्रकट होकर बोलीं — “हे रानी, आज मैं धरती पर यह देखने आई हूँ कि कौन जाग रहा है और मेरी पूजा कर रहा है।”

रानी ने कहा — “माँ, मैं आपकी आराधना कर रही हूँ।”

माँ लक्ष्मी प्रसन्न होकर बोलीं — “जो भी इस रात जागकर मेरी पूजा करेगा, मैं उसे धन, सुख और समृद्धि का वरदान दूँगी।”

तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि लोग शरद पूर्णिमा की रात जागरण कर माँ लक्ष्मी की आराधना करते हैं। 

वैज्ञानिक दृष्टि से शरद पूर्णिमा का महत्व

विज्ञान के अनुसार, शरद ऋतु की यह पूर्णिमा ऐसी होती है जब वातावरण में नमी और चाँदनी का संयोजन शरीर के लिए उपयोगी माना जाता है।

इस रात चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है और उसकी रोशनी में यूवी किरणों की मात्रा कम होती है।

इसलिए चाँदनी में रखे गए दूध या खीर में कैल्शियम और अन्य पोषक तत्वों की वृद्धि होती है।

यह शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता हैl

 शरद पूर्णिमा और आध्यात्मिक संदेश

शरद पूर्णिमा हमें यह सिखाती है कि जीवन में पूर्णता तभी आती है जब हम भक्ति, प्रेम और संयम को अपनाते हैं।

यह रात हमें याद दिलाती है कि प्रकृति, चंद्रमा और मनुष्य के बीच एक गहरा आध्यात्मिक संबंध है।

इस दिन की उजली चाँदनी की तरह हमें भी अपने मन को शुद्ध, शांत और उज्जवल बनाना चाहिए।

निष्कर्ष

शरद पूर्णिमा सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और वैज्ञानिक समन्वय का प्रतीक है।

यह रात प्रेम, भक्ति और समृद्धि का संदेश देती है।

आइए इस वर्ष भी हम सब मिलकर शरद पूर्णिमा की चाँदनी में माँ लक्ष्मी और श्रीकृष्ण की आराधना करें और उनके आशीर्वाद से अपने जीवन को सुखमय बनाएं।


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Monday, 26 May 2025

वटसावित्री व्रत धार्मिक और वैज्ञानिक ,रूप से महत्वपूर्ण त्योहार है जानिये

 वटसावित्री व्रत धार्मिक और वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण त्योहार है:-

सनातन_हिंदू_धर्म में विवाह को सिर्फ एक त्योहार ही नहीं, बल्कि एक रस्म का दर्जा दिया जाता है। विवाह समारोह में दो आत्माएं जीवन भर साथ रहने की कामना करती हैं। यद्यपि पति की दीर्घायु की शुभकामना के साथ सुहाग की रक्षा के लिए व्रत, पूजा आदि जीवन की प्रक्रिया में शामिल हैं, वट सावित्री या बरसाइत पर्व का वैवाहिक जीवन में अपना विशेष महत्व है, वह शक्ति का प्रतीक है और वास्तविक है। पति के सुख-दुःख, यश-अपयश, लाभ-हानि में वह उसके साथ रहेगी। वह अंतिम यात्रा तक अपने हृदय में पति के सामने मृत्यु का भाव रखेगी और मां गौरी से प्रार्थना करेगी और पति का प्रेम बना रहे। दिल में।" वह किसी भी आपत्ति के सामने अपने पति को ढाल देती है। अपने पतिव्रता धर्म की शक्ति से, वह अपने मृत पति के जीवन को यम से भी वापस छीनने की क्षमता रखती है, जिसका  'वट सावित्री' का त्योहार उदाहरण है।

हिन्दू पन्चाङ के अनुसार हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या को वट-सावित्री व्रत मनाया जाता है। इसमें सुहागिन अपने पति की दीर्घायु की कामना के साथ भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी और वट वृक्ष की पूजा करती है। धार्मिक मान्यताएं प्रबल होती हैं। मान्यता है कि वट वृक्ष की पूजा से सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के साथ-साथ कष्टों का नाश होता है। हिंदू धर्म में वट वृक्ष को बेहद खास माना जाता है। मान्यता है कि वट वृक्ष में भगवान विष्णु का वास होता है। हिंदू धर्म में वट वृक्ष की पूजा और परिक्रमा करने का विधान है। आध्यात्मिक दृष्टि से वट वृक्ष को दीर्घायु और अमरत्व का प्रतीक माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि वट वृक्ष की जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखा में भगवान शिव का वास होता है। पेड़ से कई शाखाएँ निकलकर नीचे की ओर लटकती हैं जिन्हें 'सावित्रीदेवी' माना जाता है। यही वजह है कि वट वृक्ष की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं बहुत जल्दी पूरी होती हैं।

 #अग्नि_पुराण के अनुसार #बरगद का वृक्ष उत्सर्जन का प्रतीक है इसलिए महिलाएं संतान प्राप्ति के लिए भी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। #हिन्दू_धर्म इतना सहिष्णु माना जाता है कि वह सजीव, निर्जीव, प्रकृति के कण-कण का कृतज्ञ है। सूर्य, चंद्रमा, वायु, जल और पृथ्वी जो कुछ भी देते हैं, उसके प्रति एक दिव्य भाव होता है। हिंदू धर्म में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के त्रिदेव के समान बरगद,पिपल और नीम के पेड़ के समान माना जाता है। वट वृक्ष को ब्रह्मा के समान माना जाता है और कई त्योहारों में इसकी पूजा की जाती है। भारतीय संस्कृति में वट सावित्री व्रत आदर्श स्त्रीत्व के सौभाग्य को बढ़ाने और पवित्रता के धर्म को अपनाने का विश्वास बन गया है।

इस व्रत में वट और सावित्री दोनों का ही विशेष महत्व माना जाता है। #पराशर_ऋषि के अनुसार 'वट मूले तोपवास' पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक साथ रहते हैं। इसके नीचे मूल पूजा करने से दुर्भाग्य का नाश होता है और सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। वट वृक्ष ज्ञान और निर्वाण का भी प्रतीक है। यह तथ्य है कि भगवान बुद्ध को वट वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था, इस कहावत का तत्काल प्रमाण है। पुराणों में यह भी वर्णित है कि जब पूरी पृथ्वी कल्प या प्रलय में डूब गई थी, तब केवल वट वृक्ष ही बचा था। अक्षय वट कहे जाने वाले इस पेड़ की पत्तियों पर भगवान शिशु रूप में सृष्टि और अनंत काल के रहस्य को देखते हैं।

#महाकवि_कालिदास के महाकाव्य "#रघुवंशम" और चीनी यात्री 'ह्वेनसांग' के यात्रा वृत्तांत में भी अक्षय वट का प्रसंग महत्वपूर्ण है। अक्षय वट को आज भी प्रयाग में त्रिवेणी के तट पर स्थित माना जाता है। इसी तरह जैन और बौद्ध भी इसे बहुत पवित्र मानते हैं। कहा जाता है कि अक्षयवट के बीज महात्मा बुद्ध ने प्रयाग में बोए थे। इसी तरह, जैन तीर्थंकर ऋषभदेव ने अक्षय वट के नीचे तपस्या की, जिसे प्रयाग में ऋषभदेव तपो स्थल के रूप में जाना जाता है। बनारस और गया में कई वट वृक्ष हैं जिनकी अखूट वट के रूप में पूजा की जाती है। कुरुक्षेत्र के पास ज्योतिसर नामक स्थान पर, एक वट वृक्ष है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह सुदर्शन चक्र धारण करने वाले भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए गीता उपदेश का साक्षी है।

इसी प्रकार ज्योतिषीय दृष्टि से वट वृक्ष को मघा नक्षत्र का प्रतीक माना गया है।मघा नक्षत्र में जन्म लेने वालों को वट वृक्ष की पूजा करनी चाहिए और वट वृक्ष लगाना चाहिए। शास्त्रों में वट वृक्ष को अमर माना गया है। वृक्ष की उत्पत्ति से संबंधित कथा वामन पुराण में बहुत प्रचलित है। कहा जाता है कि आश्विन मास में जब विष्णु की नाभि से कमल प्रकट हुआ तो अन्य देवताओं से भी अनेक वृक्ष उत्पन्न हुए। उस समय यक्षों के राजा मणिभद्र से वट वृक्ष का जन्म हुआ। यक्षों से घनिष्ठ सम्बन्ध होने के कारण ये यक्षव, यक्षतरु, यक्ष्वारुक आदि नामों से प्रसिद्ध हैं।

इसी प्रकार #रामायण में 'सुभद्रावत' नामक वट वृक्ष का वर्णन मिलता है। जिसकी टहनियों को गरुड़ ने तोड़ा था। रामायण में अक्षय वट की कथा भी बहुत प्रचलित है। वाल्मीकि रामायण में भी इसे 'श्यामण्यग्रोध' कहा गया है। यमुना के किनारे का वट अत्यंत विशाल था और उसकी छाया में घना अँधेरा मीलों तक फैल गया था। जिसने उन्हें 'श्यामण्योगढ़' नाम दिया राम, लक्ष्मण और सीता ने अपनी वन यात्रा के दौरान वट वृक्ष को प्रणाम किया और यमुना को पार करने के लिए आगे बढ़े।

ऐसा माना जाता है कि देवी सावित्री ने ज्येष्ठ माह की अमावस्या के दिन वट वृक्ष की छाया में अपने पति को जीवित कर दिया था। तभी से इस दिन सुहागिन स्त्रियों के लिए वट वृक्ष की पूजा विशेष हो गई। हिंदू धर्म का पालन करते हुए, महिलाएं अपने अपरिवर्तनीय और अखंड विवाह की रक्षा के लिए वट वृक्ष के नीचे पूजा, आरती, वन्दना और कथा श्रवण करती है।

संकलन संपादन ✍️ माँ भगवती बालसंस्कारशाला                


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Wednesday, 25 September 2024

जीवीत्पुत्रीका व्रत–2024 -जितिया सम्पूर्ण पूजन विधि-जीतिया व्रत कथाएँ-जीमूतवाहन की कथा-चिल्हो-सियारो की कथा-

 .                        (जीवीत्पुत्रीका व्रत–2024)

        बुधवार दिनांक 25 सितम्बर 2024 तदनुसार संवत् २०८१ अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आने वाला व्रत–

          हिन्दू पंचांग के अनुसार, हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, 24 सितम्बर को सूर्योदय के उपरांत दोपहर 12:39 पर अष्टमी तिथि प्रारम्भ हो रही है और 25 सितम्बर को दोपहर 12 बजकर 10 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार, जीवित्पुत्रिका व्रत 25 सितम्बर को रखा जाएगा। 24 सितम्बर मंगलवार को नहाए-खाय होगा। 25  सितम्बर बुधवार को निर्जला व्रत रखा जाएगा। 26 सितम्बर गुरुवार को सूर्योदय के बाद व्रत पारण किया जाएगा।

                           जीवीत्पुत्रीका व्रत

          जीवित्पुत्रिका व्रत को जितिया या जिउतिया व्रत भी कहा जाता है। सुहागिन स्त्रियां इस दिन निर्जला उपवास करती हैं। महिलाएँ अपनी सन्तान की लम्बी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए इस व्रत को रखती हैं। यह व्रत मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखण्ड के कई क्षेत्रों में किया जाता है। 

          उत्तर पूर्वी राज्यों में जीवित्पुत्रिका व्रत बहुत लोकप्रिय है। इस जीवीत्पुत्रीका (जीतिया) व्रत के नियम बेहद कठिन होते हैं। जितिया व्रत तीन दिनों तक चलता है। पहला दिन नहाए-खाए, दूसरा दिन जितिया निर्जला व्रत और तीसरे दिन पारण किया जाता है।

                     “जितिया सम्पूर्ण पूजन विधि”

01. स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

02. भगवान जीमूतवाहन की पूजा करें।

03. भगवान जीमूतवाहन की कुशा से निर्मित प्रतिमा को धूप-दीप, चावल, पुष्प आदि अर्पित करें।

04. मिट्टी तथा गाय के गोबर से चील व सियारिन की मूर्ति बनाएं।

05. इनके माथे पर लाल सिन्दूर का टीका लगाएं।

06. जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा कहें या सुनें।

07. माँ को 16 पेड़ा, 16 दूब की माला, 16 खड़ा चावल, 16 गांठ का धागा, 16 लौंग, 16 इलायची, 16 पान, 16 खड़ी सुपारी व श्रृंगार का सामान अर्पित करें।

08. वंश की वृद्धि और प्रगति के लिए उपवास कर बांस के पत्रों से पूजन करें

                            “जीतिया व्रत कथाएँ”

          पार्वतीजी ने एक स्थान पर स्त्रियों को विलाप करते देखा तो शिवजी से उसका कारण पूछा। शिवजी ने बताया–‘इन स्त्रियों के पुत्रों का निधन हो गया है इसलिए ये विलाप कर रही हैं।’

          पार्वतीजी बहुत दुःखी हो गईं। उन्होंने कहा–‘हे नाथ एक माता के लिए इससे अधिक हृदय विदारक बात क्या हो सकती है कि उसके सामने उसका पुत्र मर जाए। इससे मुक्ति का कोई तो मार्ग हो, कृपया बतायें।’

          शिवजी ने कहा–‘हे देवी जो विधाता द्वारा रचित है उसमें हेर-फेर नहीं हो सकता किन्तु जीमूतवाहन की पूजा से माताएँ अपनी सन्तान पर आए प्राणघाती संकटों को भी टाल सकती हैं।

          जो माता आश्विन मास की कृष्णपक्ष की अष्टमी को जीमूतवाहन की पूजा विधि-विधान से करेगी उसकी सन्तान के संकटों का नाश होगा।’

          पार्वतीजी के अनुरोध पर शिवजी ने उन मृत बालकों को पुनः जीवित कर दिया। इस कारण ही इसे जीवितपुत्रिका व्रत कहा जाता है।

          जीमूतवाहन की कथा ही मुख्य रूप से सुनी जाती है किन्तु आंचलिक क्षेत्रों में कई कथाएँ प्रचलित हैं जिसमें चिल्हो-सियारो की कथा भी है। आपको जीवितपुत्रिका की संक्षिप्त व्रत कथा सुनाते हैं।

                             “जीमूतवाहन की कथा”

          गन्धर्वों के राजकुमार का नाम जीमूतवाहन था। वे बडे उदार और परोपकारी थे। जीमूतवाहन के पिता ने वृद्धावस्था में वानप्रस्थ आश्रम में जाते समय इनको राजसिंहासन पर बैठाया किन्तु इनका मन राज-पाट में नहीं लगता था।

          वह राज्य का भार अपने भाइयों पर छोडकर स्वयं वन में पिता की सेवा करने चले गए। वन में ही जीमूतवाहन को मलयवती नामक राजकन्या से भेंट हुई और दोनों में प्रेम हो गया।

          एक दिन जब वन में भ्रमण करते हुए जीमूतवाहन काफी आगे चले गए, तब उन्हें एक वृद्धा विलाप करते हुए दिखी। पूछने पर वृद्धा ने रोते हुए बताया–‘मैं नागवंश की स्त्री हूँ। मुझे एक ही पुत्र है। पक्षीराज गरुड के कोप से मुक्ति दिलाने के लिए नागों ने यह व्यवस्था की है वे गरूड को प्रतिदिन भक्षण हेतु एक युवा नाग सौंपते हैं।

          आज मेरे पुत्र शंखचूड की बलि का दिन है। आज मेरे पुत्र के जीवन पर संकट है और थोड़ी देर बाद ही मैं पुत्रविहीन हो जाऊँगी। एक स्त्री के लिए इससे बड़ा दुख क्या होगा कि उसके जीते जी उसका पुत्र न रहे।’

          जीमूतवाहन को यह सुनकर बड़ा दुख हुआ। उन्होंने उस वृद्धा को आश्वस्त करते हुए कहा–‘डरो मत। मैं तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा करूँगा। आज उसके स्थान पर स्वयं मैं अपने आपको उसके लाल कपडे में ढ़ककर वध्य-शिला पर लेटूँगा ताकि गरूड मुझे खा जाए पर तुम्हारा पुत्र बच जाए।’

          इतना कहकर जीमूतवाहन ने शंखचूड के हाथ से लाल कपडा ले लिया और वे उसे लपेटकर गरुड को बलि देने के लिए चुनी गई वध्य-शिला पर लेट गए। नियत समय पर गरुड बडे वेग से आए और वे लाल कपडे में ढ़के जीमूतवाहन को पंजे में दबोचकर पहाड के शिखर पर जाकर बैठ गए।

          गरूड़ ने अपनी कठोर चोंक का प्रहार किया और जीमूतवाहन के शरीर से मांस का बड़ा हिस्सा नोच लिया। इसकी पीड़ा से जीमूतवाहन की आँखों से आँसू बह निकले और वह दर्द से कराहने लगे।

          अपने पंजे में जकड़े प्राणी की आँखों में से आँसू और मुँह से कराह सुनकर गरुड़ बडे आश्चर्य में पड गए क्योंकि ऐसा पहले कभी न हुआ था। उन्होंने जीमूतवाहन से उनका परिचय पूछा। जीमूतवाहन ने सारा किस्सा कह सुनाया कि कैसे एक स्त्री के पुत्र की रक्षा के लिए वह अपने प्राण देने आए हैं। आप मुझे खाकर भूख शांत करें।

          गरुड उनकी बहादुरी और दूसरे की प्राणरक्षा के लिए स्वयं का बलिदान देने की हिम्मत से बहुत प्रभावित हुए। उन्हें स्वयं पर पछतावा होने लगा। 

          वह सोचने लगे कि ‘एक यह मनुष्य है जो दूसरे के पुत्र की रक्षा के लिए स्वयं की बलि दे रहा है और एक मैं हूँ जो देवों के संरक्षण में हूँ किन्तु दूसरों की सन्तान की बलि ले रहा हूँ।’ उन्होंने जीमूतवाहन को मुक्त कर दिया।

          गरूड ने कहा–‘हे उत्तम मनुष्य मै, तुम्हारी भावना और त्याग से बहुत प्रसन्न हूँ। मैंने तुम्हारे शरीर पर जो घाव किए हैं उसे ठीक कर देता हूँ। तुम अपनी प्रसन्नता के लिए मुझसे कोई वरदान मांग लो।’

          राजा जीमूतवाहन ने कहा–‘हे पक्षीराज ! आप तो सर्वसमर्थ हैं। यदि आप प्रसन्न हैं और वरदान देना चाहते हैं तो आप सर्पों को अपना आहार बनाना छोड़ दें। आपने अब तक जितने भी प्राण लिए हैं उन्हें जीवन प्रदान करें।’

          गरुड ने सबको जीवनदान दे दिया तथा नागों की बलि न लेने का वरदान भी दिया। इस प्रकार जीमूतवाहन के साहस से नाग-जाति की रक्षा हुई। 

          गरूड़ ने कहा–‘तुम्हारी जैसी इच्छा वैसा ही होगा। हे राजा! जो स्त्री तुम्हारे इस बलिदान की कथा सुनेगी और विधिपूर्वक व्रत का पालन करेगी उसकी सन्तान मृत्यु के मुख से भी निकल आएगी।’

          तब से ही पुत्र की रक्षा हेतु जीमूतवाहन की पूजा की प्रथा शुरू हो गई।

          यह कथा कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर ने माता पार्वती को सुनाई थी। जीवित पुत्रिका के दिन भगवान श्रीगणेश, माता पार्वती और शिवजी की पूजा एवं ध्यान के बाद ऊपर बताई गई व्रत कथा भी सुननी चाहिए।

          इसकी पूजा शिवजी को प्रिय प्रदोषकाल में करनी चाहिए। व्रत का पारण दूसरे दिन अष्टमी तिथि की समाप्ति के पश्चात किया जाता है।

                           “चिल्हो-सियारो की कथा”

          नर्मदा नदी के पास एक नगर था कंचनबटी। उस नगर के राजा का नाम मलयकेतु था। नर्मदा नदी के पश्चिम में बालुहटा नाम की मरुभूमि थी, जिसमें एक विशाल पाकड़ के पेड़ पर एक चील रहती थी। उसे पेड़ के नीचे एक सियारिन भी रहती थी। दोनों पक्की सहेलियां थीं। 

          दोनों ने कुछ महिलाओं को देखकर जितिया व्रत करने का संकल्प लिया और दोनों ने भगवान श्री जीऊतवाहन की पूजा और व्रत करने का प्रण ले लिया। लेकिन जिस दिन दोनों को व्रत रखना था, उसी दिन शहर के एक बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गई और उसका दाह संस्कार उसी मरुस्थल पर किया गया। 

          सियारिन को अब भूख लगने लगी थी। मुर्दा देखकर वह खुद को रोक न सकी और उसका व्रत टूट गया। पर चील ने संयम रखा और नियम व श्रद्धा से अगले दिन व्रत का पारण किया। “श्रीजी की चरण सेवा” की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ के साथ जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें। अब आप हमारे पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी पा सकते हैं, लिंक हमारी फेसबुक प्रोफाइल पर देखें। अगले जन्म में दोनों सहेलियों ने ब्राह्मण परिवार में पुत्री के रूप में जन्म लिया। उनके पिता का नाम भास्कर था। चील, बड़ी बहन बनी और उसका नाम शीलवती रखा गया। 

          शीलवती की शादी बुद्धिसेन के साथ हुई। सियारन, छोटी बहन के रूप में जन्मी और उसका नाम कपुरावती रखा गया। उसकी शादी उस नगर के राजा मलायकेतु से हुई। 

          अब कपुरावती कंचनबटी नगर की रानी बन गई। भगवान जीऊतवाहन के आशीर्वाद से शीलवती के सात बेटे हुए। पर कपुरावती के सभी बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे। 

          कुछ समय बाद शीलवती के सातों पुत्र बड़े हो गए। वे सभी राजा के दरबार में काम करने लगे। कपुरावती के मन में उन्हें देख ईर्ष्या की भावना आ गयी। 

          उसने राजा से कहकर सभी बेटों के सर काट दिए। उन्हें सात नए बर्तन मंगवाकर उसमें रख दिया और लाल कपड़े से ढककर शीलवती के पास भिजवा दिया। 

          यह देख भगवान जीऊतवाहन ने मिट्टी से सातों भाइयों के सर बनाए और सभी के सिर को उसके धड़ से जोड़कर उन पर अमृत छिड़क दिया। इससे उनमें जान आ गई। 

          सातों युवक जिन्दा हो गए और घर लौट आए। जो कटे सर रानी ने भेजे थे वे फल बन गए। दूसरी ओर रानी कपुरावती, बुद्धिसेन के घर से सूचना पाने को व्याकुल थी। जब काफी देर सूचना नहीं आई तो कपुरावती स्वयं बड़ी बहन के घर गयी। 

          वहाँ सबको जिंदा देखकर वह सन्न रह गयी। जब उसे होश आया तो बहन को उसने सारी बात बताई। अब उसे अपनी गलती पर पछतावा हो रहा था। 

          भगवान जीऊतवाहन की कृपा से शीलवती को पूर्व जन्म की बातें याद आ गईं। वह कपुरावती को लेकर उसी पाकड़ के पेड़ के पास गयी और उसे सारी बातें बताईं। 

          कपुरावती बेहोश हो गई और मर गई। जब राजा को इसकी खबर मिली तो उन्होंने उसी जगह पर जाकर पाकड़ के पेड़ के नीचे कपुरावती का दाह-संस्कार कर दिया !


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