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Friday, 29 August 2025

હોકીના જાદુગર મેજર ધ્યાનચંદ નો આજે જન્મ દિવસ છે -રાષ્ટ્રીય રમત દિવસ..વધુ જાણો (Mejor Dhyan chand)

 

જન્મદિવસ : ૨૯ ઓગસ્ટ ૧૯૦૫ 

●જન્મ : પ્રયાગરાજ-ભારત. 

● હોકીના જાદુગર તરીકે પ્રસિદ્ધ થયા.

● પદ્મભૂષણ થી સન્માનિત થયા.

એક સંવાદને જાણીએ.... 

હિટલર : જ્યારે તમે હોકી નથી રમતા હોતા ત્યારે બીજું શું કરો છો? 

 ધ્યાનચંદ : હું ભારતીય સેનામાં છું. 

હિટલર : જર્મની આવો અમે તમને શ્રેષ્ઠ પદ આપીશું. 

ધ્યાનચંદ : ભારત મારો દેશ છે અને હું અહીં સુખી છું.



ઉપરોક્ત સંવાદ ઉપર વિચાર કરીએ તો ધ્યાનમાં આવે છે કે...    

 સ્વાભિમાની-દિશાભિમાની વ્યક્તિ સ્વાર્થ-લાલચ અને લોભમાં આવતો નથી. તેના માટે તો રાષ્ટ્ર સદૈવ સર્વપ્રથમ હોય છે. 


શ્રીરામ:

   जननी-जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।

    જનની અને જન્મભૂમિનું સ્થાન સ્વર્ગથી પણ ઉપર છે.

આપણે રાષ્ટ્રીય રમત દિવસ ઉજવીએ છીએ. 

આપણી રાષ્ટ્રીય રમત હોકી છે. 

સ્વાભિમાન અને આત્મગૌરવ સાથે હોકીને પ્રાધાન્ય આપીએ.

🔸️ ભગિની નિવેદિતા ના ક્રિકેટ વિશેના વિચારો જાણવા જેવા છે. ક્રિકેટ કરતાં  હોકી-કબડ્ડી-ફૂટબોલ વિશે માન જાગશે.

#રાષ્ટ્રીય_વિમર્શ  .... રાષ્ટ્ર સર્વપ્રથમ 


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એપલના ફેન્સ આઈફોન 17 લોન્ચિંગ તારીખ જાહેર -Apple iphone17 lonching date

 એપલના ફેન્સ આઈફોન 17 સીરીઝના લોન્ચની આતુરતાથી રાહ જોઈ રહ્યા છે. 

આગામી આઈફોન 17 સિરીઝની સત્તાવાર લોન્ચિંગ તારીખ જાહેર કરવામાં આવી છે.

એપલ આઈફોન 17ને 9 સપ્ટેમ્બરે લોન્ચ કરશે. 

આઈફોન 17 સીરીઝમાં એપલ ચાર નવા મોડલ રજૂ કરશે : આઈફોન 17, 

આઈફોન 17 એર, 

આઈફોન 17 પ્રો અને આઈફોન 17 પ્રો મેક્સ. 

આ નવા આઈફોનમાં પાછલી જનરેશનની તુલનામાં ઘણા મોટા અપગ્રેડ મળવાની અપેક્ષા છે.



one17 #newsphone #viral


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Wednesday, 27 August 2025

“ऋषि पंचमी”-ऋषि पंचमी का महत्व और पूजाविधि-ऋषि पंचमी व्रत की कथा

  भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का प्रारम्भ बुधवार 27 अगस्त 2025 को सायं 03:44 पर हो रहा है, जो अगले दिन गुरुवार 28 अगस्त 2025 को सायं 05:56 तक रहेगी।  

 धार्मिक मान्यतानुसार, ऋषि पंचमी का अवसर मुख्य रूप से सप्तर्षि के रूप में प्रसिद्ध सात महान ऋषियों को समर्पित है। ऋषि पंचमी के दिन पूरे विधि-विधान के साथ ऋषियों के पूजन के बाद कथापाठ और व्रत रखा जाता है।  

 ऋषि पंचमी का पवित्र दिन महान भारतीय ऋषियों की स्मृति में मनाया जाता है। सप्तर्षि से जुड़े हुए सात ऋषियों के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने पृथ्वी से बुराई को खत्म करने के लिए स्वयं के जीवन का त्याग किया और मानव जाति के सुधार के लिए काम किया। हिंदू मान्यताओं और शास्त्रों में, यह उल्लेख किया गया है कि ये संत अपने भक्तों को अपने ज्ञान और बुद्धि से शिक्षित करते हैं ताकि हर कोई दान, मानवता और ज्ञान के मार्ग का पालन कर सके।

  ऋषि पंचमी का महत्व और पूजाविधि

 मान्यता है कि इस दिन व्रत रखना काफी ज्यादा फलदायी होता है इस व्रत को भक्ति और श्रद्धा के साथ किया जाता है। इस दिन ऋषियों का पूर्ण विधि-विधान से पूजन के बाद कथा सुनने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि यह व्रत लोगों के पापों का नाश करता है और अच्छे फल देता है। यह व्रत और ऋषियों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता, समर्पण और सम्मान की भावना को दर्शाता है।

 ऋषि पंचमी के दिन महिलाएं सरोवर या नदी विशेषकर गंगा में स्नान करती हैं। ऐसी मान्यता है कि रजस्वला के समय होने वाली तकलीफ तथा अन्य दोष के निवारण के लिए महिलाएं ऋषि पंचमी का व्रत करती हैं और स्नान करती हैं। आज के दिन महिलाएं सप्तऋषियों की पूजा करती हैं और दोष निवारण के लिए कामना करती हैं  पहले यह व्रत सभी वर्णों के पुरुषों के लिए बताया गया था लेकिन समय के साथ-साथ अब यह व्रत अधिकतर महिलाएँ करती है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। 

ऋषि पंचमी की पूजा में महिलाएं सप्त ऋषियों की मूर्ति बनाती हैं और उसकी पूजा करती हैं। इसमें प्रथम पूज्य श्री गणेश जी की पूजा भी की जाती है। उसके बाद ऋषि पंचमी की कथा सुनती हैं। ऋषि पंचमी के व्रत में महिलाएं फलाहार करती हैं और अन्य व्रत के नियमों का पालन करती हैं। दिन के अंत में ब्राह्मणों को भोजन कराती हैं और स्वयं पारण कर व्रत को पूर्ण करती हैं। ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पढ़ने के लिये हमारा फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को लाईक एवं फॉलो करें। अब आप हमारी पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी देख सकते हैं। चैनल लिंक हमारी फेसबुक पोस्टों में देखें। इस व्रत में दिन में एक बार भोजन करना चाहिए।

 ऋषि पंचमी की पूजा के लिए सप्तऋषियों की प्रतिमाओं की स्थापना कर उन्हें पंचामृत स्नान दें, जिसके बाद उनपर चंदन का लेप लगाएँ और फूलों एवं सुगंधित पदार्थों, दीप, धूप आदि अर्पण करें इसके साथ ही श्वेत वस्त्रों, यज्ञोपवीतों और नैवेद्य से पूजा और मंत्र का जाप करें।

ऋषि पंचमी व्रत की कथा

  काफी समय पहले विदर्भ नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहते थे, उनके परिवार में एक पुत्र व पुत्री थी। ब्राह्मण पुत्री का विवाह अच्छे ब्राह्मण कुल में कर देता है लेकिन काल के प्रभाव स्वरूप कन्या का पति अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है। जिसके बाद विधवा अपने घर लौट जाती है।

          एक दिन आधी रात में विधवा के शरीर में कीड़े पैदा होने लगते हैं। ऐसी हालत देखकर उसके पिता एक ऋषि के पास ले जाते हैं। ऋषि कहते हैं कि कन्या पूर्व जन्म में ब्राह्मणी थी और इसनें एक बार रजस्वला होने पर भी घर के बर्तन छू लिए और काम करने लगी। बस इसी पाप की वजह से इसके शरीर में कीड़े पड़ गए। 

          दरअसल, शास्त्रों में रजस्वला स्त्री का कार्य निषेध बताया गया है लेकिन इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया और इसका दण्ड भोगना पड़ रहा है। तब ऋषि कहते हैं कि अगर वह कन्या ऋषि पंचमी का व्रत करें और पूरे श्रद्धा भाव के साथ पूजा और क्षमा प्रार्थना करे और उसे अपने पापों से मुक्ति मिल जाएगी।

          इस प्रकार कन्या द्वारा ऋषि पंचमी का व्रत करने से उसे पापों से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।


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Tuesday, 26 August 2025

गणेश चतुर्थी -गणेश उत्सव के बारे मे रोचक जानकारी (Ganesh Chaturthi Festival)

गणेश चतुर्थी -गणेश उत्सव के बारे मे रोचक जानकारी (Ganesh Chaturthi Festival)

गणेश चतुर्थी

27 अगस्त, बुधवार को भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की  चतुर्थी तिथि है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीगणेश का प्राकट्य माना जाता है। इस दिन भगवान श्रीगणेश को प्रसन्न करने के लिए व्रत व पूजन किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस दिन कुछ विशेष उपाय किए जाएं तो भगवान श्रीगणेश अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी हर मनोकामना पूरी करते हैं। अगर आप भी इस विशेष अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं तो ये उपाय विधि-विधान पूर्वक करें।


जो चाहिए वो मिलेगा गणेशजी के इन उपायों में से , कोई भी 1 करें

1. शास्त्रों में भगवान श्रीगणेश का अभिषेक करने का विधान बताया गया है। गणेश चतुर्थी पर भगवान श्रीगणेश का अभिषेक करने से विशेष लाभ होता है। इस दिन आप शुद्ध पानी से श्रीगणेश का अभिषेक करें। साथ में गणपति अथर्व शीर्ष का पाठ भी करें। बाद में मावे के लड्डुओं का भोग लगाकर भक्तों में बांट दें।

2. ज्योति शास्त्र के अनुसार, गणेश यंत्र बहुत ही चमत्कारी यंत्र है। गणेश चतुर्थी पर घर में इसकी स्थापना करें। इस यंत्र की स्थापना व पूजन से बहुत लाभ होता है। इस यंत्र के घर में रहने से किसी भी प्रकार की बुरी शक्ति घर में प्रवेश नहीं करती।

3. अगर आपके जीवन में बहुत परेशानियां हैं, तो आप गणेश चतुर्थी को हाथी को हरा चारा खिलाएं और गणेश मंदिर जाकर अपनी परेशानियों का निदान करने के लिए प्रार्थना करें। इससे आपके जीवन की परेशानियां कुछ ही दिनों में दूर हो सकती हैं।

4. अगर आपको धन की इच्छा है, तो इसके लिए आप गणेश चतुर्थी को सुबह स्नान आदि करने के बाद भगवान श्रीगणेश को शुद्ध घी और गुड़ का भोग लगाएं। थोड़ी देर बाद घी व गुड़ गाय को खिला दें। ये उपाय करने से धन संबंधी समस्या का निदान हो सकता है।

5. गणेश चतुर्थी पर सुबह स्नान आदि करने के बाद समीप स्थित किसी गणेश मंदिर जाएं और भगवान श्रीगणेश को 21 गुड़ की गोलियां बनाकर दूर्वा के साथ चढ़ाएं। इस उपाय से भगवान आपकी हर मनोकामना पूरी कर सकते हैं ।

6. गणेश चतुर्थी पर पीले रंग की गणेश प्रतिमा अपने घर में स्थापित कर पूजा करें। पूजन में श्रीगणेश को हल्दी की पांच गठान श्री गणाधिपतये नम: मंत्र का उच्चारण करते हुए चढ़ाएं। इसके बाद 108 दूर्वा पर गीली हल्दी लगाकर श्री गजवकत्रम नमो नम: का जप करके चढ़ाएं। यह उपाय लगातार 10 दिन तक करने से प्रमोशन होने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

7. गणेश चतुर्थी पर किसी गणेश मंदिर में  जाएं और दर्शन करने के बाद अपनी इच्छा के अनुसार गरीबों को दान करें। कपड़े, भोजन, फल, अनाज आदि दान कर सकते हैं। दान के बाद दक्षिणा यानी कुछ रुपए भी दें। दान से पुण्य की प्राप्ति होती है और भगवान श्रीगणेश भी अपने भक्तों पर प्रसन्न होते हैं।

8. यदि बेटी का विवाह नहीं हो पा रहा है, तो गणेश चतुर्थी पर विवाह की कामना से भगवान श्रीगणेश को मालपुए का भोग लगाएं व व्रत रखें। शीघ्र ही उसके विवाह के योग बन सकते हैं।

9. गणेश चतुर्थी को दूर्वा (एक प्रकार की घास) के गणेश बनाकर उनकी पूजा करें। मोदक, गुड़, फल, मावा-मिष्ठान आदि अर्पण करें। ऐसा करने से भगवान गणेश सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

10. यदि लड़के के विवाह में परेशानियां आ रही हैं, तो वह गणेश चतुर्थी पर भगवान श्रीगणेश को पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं। इससे उसके विवाह के योग बन सकते हैं।

11. गणेश चतुर्थी पर व्रत रखें। शाम के समय घर में ही गणपति अर्थवशीर्ष का पाठ करें। इसके बाद भगवान श्रीगणेश को तिल से बने लड्डुओं का भोग लगाएं। इसी प्रसाद से अपना व्रत खोलें और भगवान श्रीगणेश से मनोकामना पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।

गणेश उत्सव

27 अगस्त 2025 बुधवार से गणेश उत्सव शुरू हो रहा है जो की ये 10 दिन भगवान गणेश को प्रसन्न करने और उनकी कृपा पाने के लिए बहुत ही खास माने जाते हैं। वास्तुशास्त्र में भी कुछ वस्तुओं का खास संबंध भगवान गणेश से माना जाता है। यदि आज इन 5 में से एक भी वस्तु घर लाई जाए तो भगवान गणेश के साथ-साथ देवी लक्ष्मी भी प्रसन्न होती है और घर-परिवार पर उनकी कृपा हमेशा बनी रहती है।

 गणेश की नृत्य करती प्रतिमा

धन संबंधी परेशानियां दूर करने के लिए नृत्य करती गणेश प्रतिमा घर में रखना शुभ माना जाता है। प्रतिमा को इस तरह रखें कि घर के मेन गेट पर भगवान गणेश की दृष्टि रहे।

बांसुरी

बांसुरी घर में रखने से घर में लक्ष्मी का वास बना रहता है।इससे घर के वास्तु दोष दूर होते हैं और धन पाने के योग बनने लगते हैं।

एकाक्षी नारियल

जिस घर में एकाक्षी नारियल रखा जाता है और इसकी नियमित पूजा होती है, वहां नेगेटिविटी नहीं ठहरती है, न ही कभी धन-धान्य की कमी होती है।

घर के मंदिर में शंख

शंख में वास्तु दोष दूर करने की अद्भुत शक्ति होती है। जिस घर के पूजा स्थल में शंख की स्थापना भी की जाती है, वहां देवी लक्ष्मी स्वयं निवास करती हैं।

कुबेर की मूर्ति

भगवान कुबेर उत्तर दिशा के स्वामी माने जाते हैं, इसलिए उत्तर दिशा में इनकी मूर्ति रखने से घर में कभी पैसों की कमी नहीं होती।


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ત્રિનેત્રેશ્ર્વર મહાદેવ અને તરણેતર મેળાનું ઐતિહાસિક મહત્વ

સૌરાષ્ટ્રના મહત્વના મેળા 

સૌરાષ્ટ્રમાં ત્રણ મેળા મહત્વના છે. ભવનાથનો શિવરાત્રિનો મેળો, ઘેડ પ્રદેશમાં માધવપુરનો મેળો અને પાંચાળનો તરણેતરનો મેળો. આ ત્રણેય મેળાને વિવિધ રીતે વહેંચવા હોય તો એમ વહેંચી શકાય કે, તરણેતરનો મેળો એ રંગનો મેળો છે, માધવપુરનો મેળો એ રૂપનો મેળો છે અને શિવરાત્રિનો મેળો એ ભક્તિનો મેળો છે. અહીં વિવિધ રંગોમાં રમતી અને આનંદ ઉલ્લાસથી પોતાની અભિવ્યક્તિ જાહેર કરતી લોકજીવનને ધબકતું રાખતી પ્રજા મન મૂકીને મેળામાં મહાલે છે. તરણેતર સુરેન્દ્રનગર જિલ્લાના થાનગઢ તાલુકામાં આવેલું એક ગામ છે અને ચોટીલાથી આશરે ૩૯ કિલોમીટરના અંતરે તરણેતર ગામમાં આ મેળાનું આયોજન કરવામાં આવે છે. તરણેતર મુખ્યત્વે તેનાં તરણેતર મેળાથી વધારે પ્રખ્યાત છે, જે અહીં આવેલા પ્રસિદ્ધ ભગવાન ત્રિનેત્રેશ્વર મંદિર પાસે ભરાય છે. વાસુકિ નાગની આ ભૂમિ છે. 


તરણેતરનું મંદીર

તરણેતર મંદીરની સ્થાપના વિશે લોકવાયકા છે કે અયોધ્યાનાં સૂર્યવંશી રાજા યુવનાશ્વ નિ:સંતાન હોવાથી તેમણે તેમના ગુરુ વશિષ્ઠના સુચનથી યજ્ઞ કર્યો હતો. તેના તપોબળે તેમને ત્યાં પુત્રનો જન્મ થયો હતો જેનું નામ માંધાતા હતુ અને આ તરણેતરનું મંદીર માંધાતાએ બંધાવેલ હતું. તે ઉપરાંત આ મંદીર સાથે એક એવી વાત પણ જોડાયેલ છે જે મહાભારત કાળની છે. તે સમયે દ્રુપદ નગરી પાંચાળમાં હતી. મહાભારતની કથા અનુસાર દ્રુપદની પુત્રી દ્રૌપદીનો સ્વયંવર તરણેતરમાં યોજવામાં આવેલ હતો. તે સમયે બ્રાહ્મણના વેશમાં પાંડવો સ્વયંવરમાં આવેલા અને અત્યારે આ સ્થળ ઉપર જે કુંડ આવેલ છે, તેમાં અર્જુન દ્વારા મત્સવેધ થયો હતો અને આ રીતે દ્રૌપદીનાં વિવાહનો પ્રંસંગ જોડાયેલો છે. 


તરણેતરનું મંદીર દસમી સદીનું હોવાની શકયતા છે કારણ કે મંદીરની શૈલી ગુર્જર પ્રતિહાર પ્રકારની હોવાથી સંશોધનકારો આમ કહે છે. પ્રતિહાર રાજાઓ શિવાલયો બાંધવાના શોખીન હતા, જેથી તેઓએ આ મંદીરનો જીર્ણોધાર કરાવ્યો હોય. આમ પણ પ્રતિહાર રાજાઓ આઠમી સદીમાં સૌરાષ્ટ્રમાં આવ્યા હોય તેવા પ્રમાણો ઇતિહાસમાં મળે છે. અત્યારનું જે મંદીર છે તેનો જીર્ણોધાર લખતર સ્ટેટનાં રાજવી કરણસિંહજી વજેરાજસિંહજી ઝાલા (1846/1924) એ ઈ.સ. ૧૯૦૨ ની સાલમાં ઓગસ્ટ મહિનામાં તેમના પુત્રી કરણબાનાં સ્મરણાર્થે કરાવ્યો હતો, જેનો શિલાલેખ પણ છે. મંદીરનો ઘાટ જુનો છે. તેના ઉપર નવા મંદીરની બાંધણી થઈ છે. આ મંદીરથી થોડે દુર તરણેતર ગામ આવેલું છે. આ મંદીર પાસે ૧૦૦ વીઘા જેવી ખેતીની જમીન છે. મંદીરની સામેની બાજુએ તળાવ છે. તરણેતરનાં આ મંદીરમાં બે શિવલીંગ સ્થાપિત છે. જાણકારોના કહેવા મુજબ મોટું શિવલીંગ પ્રાચીન છે અને તેની બાજુમાં આવેલા પ્રમાણમાં નાના શિવલીંગની પ્રતિષ્ઠા કરણસિંહજીએ મંદીરનો જીર્ણોધાર કર્યો ત્યારે થઇ છે. આ મંદીરની કોતવણી અને શિલ્પ અદભુત, મોહક અને મનોહર છે. મંદીરની બાજુમાં ત્રણ કુંડ આવેલાં છે જે વિષ્ણુકુંડ, શિવકુંડ અને બ્રહ્મકુંડ તરીકે ઓળખાય છે. આ મંદીરની બાંધણી ખુબ જુની તથા  કલાત્મક હોવાથી તેમજ શિલ્પકલાનો વારસો સચવાયેલ હોવાથી આ મંદીર પુરાતત્વ ખાતા હસ્તક લેવાયલ છે. તરણેતરનો મેળો યૌવન, રંગ, રૂપ, મસ્તી, લોકગીત, દુહા અને લોકનૃત્યનો મેળો છે. સૌરાષ્ટ્રની સમૃદ્ધ લોકસંસ્કૃતિને જોવા, જાણવા અને માણવા માટે તરણેતરનો મેળો એક અદ્ભૂત સ્થાન છે.

તરણેતરનો મેળો ક્યારે ભરાય છે?તેનું મહત્વ

 તરણેતરનો મેળો ભાદરવા ત્રીજ, ચોથ અને પાંચમ એમ ત્રણ દિવસ ચાલે છે, જેમાં ભાદરવા સુદ પાંચમ એટલે કે ઋષિપંચમીનો દિવસ શ્રેષ્ઠ માનવામાં આવે છે. આ વર્ષે તરણેતર મેળો 26 થી 29 ઓગસ્ટ 2025 દરમિયાન યોજાશે. પાંચાળ પ્રદેશની પ્રજા દુર ન જઈને એટલે તરણેતરને ગંગા અને હરદ્વાર માનીને તરણેતરમાં આવેલ ત્રણેય કુંડમાં પોતાના મૃત્યુ પામેલા સ્વજનોના અસ્થિ પધરાવી, કુંડમાં નાહીને ગંગામાં નાહયાનું પુણ્ય માને છે અને આ દિવસે જ ત્રિનેત્રેશ્વર મહાદેવના મંદીર ઉપર બાવન ગજની ધજા ચડાવવામાં આવે છે, જે પારંપારિક રીતે પાળીયાદ વિશામણ બાપુની જગ્યાના મહંત શ્રી દ્વારા વાજતે ગાજતે શાસ્ત્રોક્ત વિધિ મુજબ ચડાવવામાં આવે છે. તરણેતરનાં મેળાની ત્રણ વિશેષતાઓ છે - સામસામા બોલાતા દુહા, રાવટીઓમાં વહેલી રાતથી માંડીને સવાર સુધી ચાલતી ભજનોની લહેર અને ૨૦૦ ઉપરાંત ભાઈ-બહેનોના એક સાથે લેવાતા હુડા રાસ. 


મેળા નું ખાસ આકર્ષણ રંગબેરંગી છત્રીઓ

મેળામાં ગ્રામ્ય સ્ત્રીઓ ત્રણ તાળીના રાસ લેતી ગાતી હોય ત્યારે રાસડામાં એવી હિલોળા લે, જાણે સો શરણાઈઓ સામટી વાગતી હોય એવું વાતાવરણ સર્જાય છે. મીઠી હલકે, મોકળે કંઠે ગાતી અને વાયુવેગે ઊપડતી સ્ત્રીઓનાં રાસડા આકર્ષક હોય છે. ભરવાડોના રાસમાં 30 થી 60 સ્ત્રી પુરુષો હોય છે. અહીં દાંડિયારાસ રમે ત્યારે સ્ફૂર્તિથી દાંડિયા ખોડી દૂર જઈ ઊભા રહે અને એટલી જ સ્ફૂર્તિથી પાછા ભેગા થઈ જાય. કોળી સૌરાષ્ટ્રની રંગીલી કોમ છે. ત્યાં તો ગમે તે ઉંમરનો આદમી પણ ઉત્સવ ટાણે આંખમાં સુરમો, માથે લાલ આંટિયાળી ગોળ પાઘડી, પાઘડીને આભલાં ભરેલ લીલા પટ્ટાનું બાંધણું, કેડે બાંધી હોય રંગીલી ભેટ, વળી વધારે રંગીલો હોય તો રાસની વચમાં બબ્બે હાથમાં બે છત્રીઓ ઝુલાવતો જાય. છત્રી પણ કેવી ? સુંદર ભરત ભરેલી સોળ સોળ સળિયાની, સળિયે સળિયે લાલ, પીળા ને લીલા રેશમી રૂમાલ ફરકતા હોય, બહુ લાંબા નહિ તેમ બહુ ટૂંકા નહિ. આ છત્રી કલારસિકોનું આકર્ષણ બને છે. પાતળી કાઠીનાં શરીર અને પાછાં અજબ ચેતનવંતાં. રાસની સાથે ધ્રબુકતા ચાર ચાર ઢોલ અને જોડિયા પાવા સાથે સેંકડોની સંખ્યામાં સ્ત્રીઓ રાસડા લેતી હોય. આ બધાંની સાથે તેમનો ભવ્ય પોશાક ! હીરમાં આભલે ચોડેલાં કમખાં, ઘાઘરા અને ઓઢણાં હોય. આ પ્રસંગે  પ્રણાલિકાગત વસ્ત્રો અને તેવાં જ આભૂષણો પહેરેલાં અનેક કોમોનાં સ્ત્રી પુરુષો અનેરો રંગ જમાવે છે. રાસમાં પુરૂષો જેમ દાંડિયાથી રમે છે તેમ સ્ત્રીઓ મટકી પણ બહુ સરસ લે છે. બંને હાથમાં લોઢાના કે રૂપાના કરડા પહેર્યા હોય અને હાથમાં તાંબા પિત્તળના ઘડા હોય. હીંચ સાથે ઘડા ઝુલાવતી જાય. ઉપર, નીચે અને પાછા ખભેથી સરકાવીને માથા ઉપરથી હિલોળીને હેઠા લાવતી જાય અને ઘડા સાથે તાલબદ્ધ કરડા વગાડતી જાય. આ લોકમેળામાં ગ્રામીણ ઓલમ્પિક્સ, પશુ પ્રદર્શન, પશુ હરીફાઈ અને રાસ-ગરબા સ્પર્ધાનું પણ આયોજન અલગ અલગ દિવસે કરવામાં આવે છે. આમ તરણેતરનો મેળો રાસ, તાલ, લય, ગીત અને નૃત્યની દ્રષ્ટિએ તેમજ ભાતીગળ પોશાકના વૈવિધ્યથી દેશવિદેશમાં ખૂબ જ લોકપ્રિય બન્યો છે. જો તમે પણ તરણેતરના મેળાની મુલાકાત લેવાનું વિચારી રહ્યા હોવ તો સાથે તરણેતરના મંદિરની મુલાકાત લેવાનું પણ ચૂકશો નહીં હોં..! 






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जलेबी हनुमान मंदिर मांगरोल गाँव सूरत जिला गुजरात

गुजरात में यहां विराजते हैं जलेबी हनुमान; जानिए इस चमत्कारी मंदिर का पौराणिक इतिहास

 जलेबी हनुमान मंदिर: सूरत ज़िले के मंगरोल गाँव के बाहरी इलाके में स्थित प्रसिद्ध जलेबीधारी हनुमान दादा के मंदिर में हर शनिवार भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। यहाँ भक्त दादा को जलेबी चढ़ाकर अपनी मनोकामनाएँ माँगते हैं, जो जलेबीधारी हनुमान दादा पूरी करते हैं। यहाँ हनुमानजी दक्षिणमुखी होकर विराजमान हैं। मंदिर में छत नहीं है।


 हनुमानजी एक विलो और नीम के पेड़ की छाया में विराजमान हैं।

   मांगरोल गाँव में पाठक परिवार के खेत में स्थित हनुमान मंदिर जलेबी हनुमानजी के नाम से प्रसिद्ध है। भक्त कह रहे हैं कि यहाँ का हनुमानजी मंदिर स्वयंभू है। मंदिर की छत पर एक बरगद और एक नीम के पेड़ की छाया में हनुमानजी विराजमान हैं। मंदिर के व्यवस्थापकों ने मंदिर के लिए छत बनाने के कई बार प्रयास किए, लेकिन छत नहीं बनी। इस बारे में मंदिर व्यवस्थापक ने कहा कि हमारे जीवन में कई समस्याएँ जलेबी की तरह होती हैं, जिनका समाधान हनुमानजी के अलावा संभव नहीं है।

 हनुमानजी स्वयं प्रकट हुए थे,


लोग दूर-दूर से जलेबी हनुमान दादा के दर्शन करने और अपनी मनोकामनाएं पूरी करने आते हैं। इस मंदिर का ऐतिहासिक महत्व है, इसलिए जलेबी हनुमान दादा का मंदिर बहुत प्रसिद्ध मंदिर है। गायकवाड़ शासन के दौरान, मंगरोल गांव को बंधरी-मंगरोल के नाम से जाना जाता था। इसलिए गांव बहुत प्रसिद्ध था। गांव को अब मोटा मिया मंगरोल के नाम से जाना जाता है। लेकिन अब लोग इस गांव को जलेबी हनुमान के नाम से जानने लगे हैं। ऐसा कहा जाता है कि मंगरोल में रहने वाले हिरेन पाठक को अपने पूर्वजों के नानी पारडी गांव में अपने खेत में स्वयंभू हनुमानजी की एक मूर्ति दिखाई दी थी। और पूर्वजों को एक सपना आया कि मैं यहां रह रहा हूं, और मुझे यहां से ले जाओ और मुझे किसी अन्य स्थान पर स्थापित करो। लेकिन उन्होंने मुझे गांव में स्थापित नहीं किया, इसलिए हनुमान दादा को खेत से लाया गया और मंगरोल गांव के बाहरी इलाके में स्थापित किया गया


 भक्तोकी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं

हनुमानजी जागृत रूप में मंदिर में विराजमान हैं। मंदिर में आने वाले भक्त हनुमानजी से अपनी समस्याओं के समाधान की प्रार्थना करते हैं और प्रसाद के रूप में जलेबी का भोग लगाते हैं। जो भक्त विदेश जाना चाहते हैं या जिन्हें संतान सुख नहीं मिलता, वे बड़ी संख्या में हनुमानजी की पूजा करने आते हैं और प्रसाद के रूप में जलेबी का भोग लगाते हैं। यहाँ हनुमानजी को विसाणा हनुमानजी के नाम से भी जाना जाता है। प्रत्येक शनिवार को लगभग 1000 से 1500 भक्त महाप्रसादी का लाभ उठाते हैं।

 पिछले साल, हवा

बिना छत लगाए ही छत उड़ा ले गई थी। जलेबी हनुमान मंदिर के लिए 15 से ज़्यादा बार कोशिश की जा चुकी है। फिर भी, मंदिर की छत नहीं बन पाई है। किसी न किसी कारण से छत गिर जाती है। पिछले साल, पत्ते लाकर छत बनाने की कोशिश की गई थी, लेकिन पत्ते 100 से 200 फीट दूर उड़ गए। हालाँकि, मंदिर प्रशासकों का कहना है कि उस समय हवा नहीं चल रही थी। मंदिर परिसर में एक रेस्टोरेंट, पार्किंग समेत सभी सुविधाएँ मौजूद हैं और इसके भवन पर छत भी है, सिर्फ़ मंदिर के पास छत नहीं है।

 भक्त जलेबी का प्रसाद लेकर आते हैं।


दूर-दूर से भक्त जलेबी का प्रसाद ग्रहण करने और अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए मंदिर आते हैं। भक्त तीन, पांच या ग्यारह शनिवार की मन्नत आस्था के साथ रखते हैं और भक्तों में अटूट विश्वास है कि मन्नत पूरी होती है। राज्य और राज्य के बाहर से भी भक्त हनुमानजी के दर्शन करने मंदिर आते हैं। भक्तों की जलेबी हनुमान दादा में अटूट आस्था है। कई भक्त विदेश जाने के लिए वीजा के लिए अपने पासपोर्ट के साथ दादा के दर्शन करने आते हैं और अटूट विश्वास है कि पासपोर्ट दादा को छूने और वीजा के लिए आवेदन करने से उन्हें वीजा मिल जाएगा। कई दंपत्ति जो संतान से खुश नहीं हैं वे भी दादा की मन्नत रखते हैं और दादा उनकी मनोकामना पूरी करते हैं


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Sunday, 24 August 2025

जानिए भगवान विष्णु ने क्यों लिया था वराह अवतार

 भगवान विष्णु ने कुल 24 अवतार लिए हैं। मत्स्य और कश्यप के बाद तीसरा अवतार है वराह। वराह यानी शुकर। इस अवतार के माध्यम से मानव शरीर के साथ परमात्मा का पहला कदम धरती पर पड़ा। मुख शुकर का था, लेकिन शरीर इंसानी था। उस समय हिरण्याक्ष नामक दैत्य ने अपनी शक्ति से स्वर्ग पर कब्जा कर पूरी पृथ्वी को अपने अधीन कर लिया था। हिरण्याक्ष का अर्थ है हिरण्य मतलब स्वर्ण और अक्ष मतलब आंखें। जिसकी आंखें दूसरे के धन पर लगी रहती हों, वो हिरण्याक्ष है।  


पुरातन समय में दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया तब ब्रह्मा की नाक से भगवान विष्णु वराह रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु के इस रूप को देखकर सभी देवताओं व ऋषि-मुनियों ने उनकी स्तुति की। सबके आग्रह पर भगवान वराह ने पृथ्वी को ढूंढना प्रारंभ किया। अपनी थूथनी की सहायता से उन्होंने पृथ्वी का पता लगा लिया और समुद्र के अंदर जाकर अपने दांतों पर रखकर वे पृथ्वी को बाहर ले आए। जब हिरण्याक्ष दैत्य ने यह देखा तो उसने भगवान विष्णु के वराह रूप को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर दिया। इसके बाद भगवान वराह ने अपने खुरों से जल को स्तंभित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया। इसके पश्चात भगवान वराह अंतर्धान हो गए।


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