Official Website by Vipul Prajapati Job,Education,Sports,Festivals,General Knowledge and all types of information Website


Join Our Whatsapp Group to Get Latest Updates... :Click Here
Join Our Facebook Page to Get Latest Updates... : Click Here

Join Our Telegram Group to Get Latest Updates... : Click Here

Search This Website

Showing posts with label हिन्दु त्योहार. Show all posts
Showing posts with label हिन्दु त्योहार. Show all posts

Wednesday, 27 August 2025

“ऋषि पंचमी”-ऋषि पंचमी का महत्व और पूजाविधि-ऋषि पंचमी व्रत की कथा

  भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का प्रारम्भ बुधवार 27 अगस्त 2025 को सायं 03:44 पर हो रहा है, जो अगले दिन गुरुवार 28 अगस्त 2025 को सायं 05:56 तक रहेगी।  

 धार्मिक मान्यतानुसार, ऋषि पंचमी का अवसर मुख्य रूप से सप्तर्षि के रूप में प्रसिद्ध सात महान ऋषियों को समर्पित है। ऋषि पंचमी के दिन पूरे विधि-विधान के साथ ऋषियों के पूजन के बाद कथापाठ और व्रत रखा जाता है।  

 ऋषि पंचमी का पवित्र दिन महान भारतीय ऋषियों की स्मृति में मनाया जाता है। सप्तर्षि से जुड़े हुए सात ऋषियों के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने पृथ्वी से बुराई को खत्म करने के लिए स्वयं के जीवन का त्याग किया और मानव जाति के सुधार के लिए काम किया। हिंदू मान्यताओं और शास्त्रों में, यह उल्लेख किया गया है कि ये संत अपने भक्तों को अपने ज्ञान और बुद्धि से शिक्षित करते हैं ताकि हर कोई दान, मानवता और ज्ञान के मार्ग का पालन कर सके।

  ऋषि पंचमी का महत्व और पूजाविधि

 मान्यता है कि इस दिन व्रत रखना काफी ज्यादा फलदायी होता है इस व्रत को भक्ति और श्रद्धा के साथ किया जाता है। इस दिन ऋषियों का पूर्ण विधि-विधान से पूजन के बाद कथा सुनने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि यह व्रत लोगों के पापों का नाश करता है और अच्छे फल देता है। यह व्रत और ऋषियों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता, समर्पण और सम्मान की भावना को दर्शाता है।

 ऋषि पंचमी के दिन महिलाएं सरोवर या नदी विशेषकर गंगा में स्नान करती हैं। ऐसी मान्यता है कि रजस्वला के समय होने वाली तकलीफ तथा अन्य दोष के निवारण के लिए महिलाएं ऋषि पंचमी का व्रत करती हैं और स्नान करती हैं। आज के दिन महिलाएं सप्तऋषियों की पूजा करती हैं और दोष निवारण के लिए कामना करती हैं  पहले यह व्रत सभी वर्णों के पुरुषों के लिए बताया गया था लेकिन समय के साथ-साथ अब यह व्रत अधिकतर महिलाएँ करती है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। 

ऋषि पंचमी की पूजा में महिलाएं सप्त ऋषियों की मूर्ति बनाती हैं और उसकी पूजा करती हैं। इसमें प्रथम पूज्य श्री गणेश जी की पूजा भी की जाती है। उसके बाद ऋषि पंचमी की कथा सुनती हैं। ऋषि पंचमी के व्रत में महिलाएं फलाहार करती हैं और अन्य व्रत के नियमों का पालन करती हैं। दिन के अंत में ब्राह्मणों को भोजन कराती हैं और स्वयं पारण कर व्रत को पूर्ण करती हैं। ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पढ़ने के लिये हमारा फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को लाईक एवं फॉलो करें। अब आप हमारी पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी देख सकते हैं। चैनल लिंक हमारी फेसबुक पोस्टों में देखें। इस व्रत में दिन में एक बार भोजन करना चाहिए।

 ऋषि पंचमी की पूजा के लिए सप्तऋषियों की प्रतिमाओं की स्थापना कर उन्हें पंचामृत स्नान दें, जिसके बाद उनपर चंदन का लेप लगाएँ और फूलों एवं सुगंधित पदार्थों, दीप, धूप आदि अर्पण करें इसके साथ ही श्वेत वस्त्रों, यज्ञोपवीतों और नैवेद्य से पूजा और मंत्र का जाप करें।

ऋषि पंचमी व्रत की कथा

  काफी समय पहले विदर्भ नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहते थे, उनके परिवार में एक पुत्र व पुत्री थी। ब्राह्मण पुत्री का विवाह अच्छे ब्राह्मण कुल में कर देता है लेकिन काल के प्रभाव स्वरूप कन्या का पति अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है। जिसके बाद विधवा अपने घर लौट जाती है।

          एक दिन आधी रात में विधवा के शरीर में कीड़े पैदा होने लगते हैं। ऐसी हालत देखकर उसके पिता एक ऋषि के पास ले जाते हैं। ऋषि कहते हैं कि कन्या पूर्व जन्म में ब्राह्मणी थी और इसनें एक बार रजस्वला होने पर भी घर के बर्तन छू लिए और काम करने लगी। बस इसी पाप की वजह से इसके शरीर में कीड़े पड़ गए। 

          दरअसल, शास्त्रों में रजस्वला स्त्री का कार्य निषेध बताया गया है लेकिन इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया और इसका दण्ड भोगना पड़ रहा है। तब ऋषि कहते हैं कि अगर वह कन्या ऋषि पंचमी का व्रत करें और पूरे श्रद्धा भाव के साथ पूजा और क्षमा प्रार्थना करे और उसे अपने पापों से मुक्ति मिल जाएगी।

          इस प्रकार कन्या द्वारा ऋषि पंचमी का व्रत करने से उसे पापों से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।


To Get Fast Updates Download our Apps:Android||Telegram

Stay connected with us for latest updates

Important: Please always Check and Confirm the above details with the official website and Advertisement / Notification.

Tuesday, 26 August 2025

गणेश चतुर्थी -गणेश उत्सव के बारे मे रोचक जानकारी (Ganesh Chaturthi Festival)

गणेश चतुर्थी -गणेश उत्सव के बारे मे रोचक जानकारी (Ganesh Chaturthi Festival)

गणेश चतुर्थी

27 अगस्त, बुधवार को भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की  चतुर्थी तिथि है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीगणेश का प्राकट्य माना जाता है। इस दिन भगवान श्रीगणेश को प्रसन्न करने के लिए व्रत व पूजन किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस दिन कुछ विशेष उपाय किए जाएं तो भगवान श्रीगणेश अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी हर मनोकामना पूरी करते हैं। अगर आप भी इस विशेष अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं तो ये उपाय विधि-विधान पूर्वक करें।


जो चाहिए वो मिलेगा गणेशजी के इन उपायों में से , कोई भी 1 करें

1. शास्त्रों में भगवान श्रीगणेश का अभिषेक करने का विधान बताया गया है। गणेश चतुर्थी पर भगवान श्रीगणेश का अभिषेक करने से विशेष लाभ होता है। इस दिन आप शुद्ध पानी से श्रीगणेश का अभिषेक करें। साथ में गणपति अथर्व शीर्ष का पाठ भी करें। बाद में मावे के लड्डुओं का भोग लगाकर भक्तों में बांट दें।

2. ज्योति शास्त्र के अनुसार, गणेश यंत्र बहुत ही चमत्कारी यंत्र है। गणेश चतुर्थी पर घर में इसकी स्थापना करें। इस यंत्र की स्थापना व पूजन से बहुत लाभ होता है। इस यंत्र के घर में रहने से किसी भी प्रकार की बुरी शक्ति घर में प्रवेश नहीं करती।

3. अगर आपके जीवन में बहुत परेशानियां हैं, तो आप गणेश चतुर्थी को हाथी को हरा चारा खिलाएं और गणेश मंदिर जाकर अपनी परेशानियों का निदान करने के लिए प्रार्थना करें। इससे आपके जीवन की परेशानियां कुछ ही दिनों में दूर हो सकती हैं।

4. अगर आपको धन की इच्छा है, तो इसके लिए आप गणेश चतुर्थी को सुबह स्नान आदि करने के बाद भगवान श्रीगणेश को शुद्ध घी और गुड़ का भोग लगाएं। थोड़ी देर बाद घी व गुड़ गाय को खिला दें। ये उपाय करने से धन संबंधी समस्या का निदान हो सकता है।

5. गणेश चतुर्थी पर सुबह स्नान आदि करने के बाद समीप स्थित किसी गणेश मंदिर जाएं और भगवान श्रीगणेश को 21 गुड़ की गोलियां बनाकर दूर्वा के साथ चढ़ाएं। इस उपाय से भगवान आपकी हर मनोकामना पूरी कर सकते हैं ।

6. गणेश चतुर्थी पर पीले रंग की गणेश प्रतिमा अपने घर में स्थापित कर पूजा करें। पूजन में श्रीगणेश को हल्दी की पांच गठान श्री गणाधिपतये नम: मंत्र का उच्चारण करते हुए चढ़ाएं। इसके बाद 108 दूर्वा पर गीली हल्दी लगाकर श्री गजवकत्रम नमो नम: का जप करके चढ़ाएं। यह उपाय लगातार 10 दिन तक करने से प्रमोशन होने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

7. गणेश चतुर्थी पर किसी गणेश मंदिर में  जाएं और दर्शन करने के बाद अपनी इच्छा के अनुसार गरीबों को दान करें। कपड़े, भोजन, फल, अनाज आदि दान कर सकते हैं। दान के बाद दक्षिणा यानी कुछ रुपए भी दें। दान से पुण्य की प्राप्ति होती है और भगवान श्रीगणेश भी अपने भक्तों पर प्रसन्न होते हैं।

8. यदि बेटी का विवाह नहीं हो पा रहा है, तो गणेश चतुर्थी पर विवाह की कामना से भगवान श्रीगणेश को मालपुए का भोग लगाएं व व्रत रखें। शीघ्र ही उसके विवाह के योग बन सकते हैं।

9. गणेश चतुर्थी को दूर्वा (एक प्रकार की घास) के गणेश बनाकर उनकी पूजा करें। मोदक, गुड़, फल, मावा-मिष्ठान आदि अर्पण करें। ऐसा करने से भगवान गणेश सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

10. यदि लड़के के विवाह में परेशानियां आ रही हैं, तो वह गणेश चतुर्थी पर भगवान श्रीगणेश को पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं। इससे उसके विवाह के योग बन सकते हैं।

11. गणेश चतुर्थी पर व्रत रखें। शाम के समय घर में ही गणपति अर्थवशीर्ष का पाठ करें। इसके बाद भगवान श्रीगणेश को तिल से बने लड्डुओं का भोग लगाएं। इसी प्रसाद से अपना व्रत खोलें और भगवान श्रीगणेश से मनोकामना पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।

गणेश उत्सव

27 अगस्त 2025 बुधवार से गणेश उत्सव शुरू हो रहा है जो की ये 10 दिन भगवान गणेश को प्रसन्न करने और उनकी कृपा पाने के लिए बहुत ही खास माने जाते हैं। वास्तुशास्त्र में भी कुछ वस्तुओं का खास संबंध भगवान गणेश से माना जाता है। यदि आज इन 5 में से एक भी वस्तु घर लाई जाए तो भगवान गणेश के साथ-साथ देवी लक्ष्मी भी प्रसन्न होती है और घर-परिवार पर उनकी कृपा हमेशा बनी रहती है।

 गणेश की नृत्य करती प्रतिमा

धन संबंधी परेशानियां दूर करने के लिए नृत्य करती गणेश प्रतिमा घर में रखना शुभ माना जाता है। प्रतिमा को इस तरह रखें कि घर के मेन गेट पर भगवान गणेश की दृष्टि रहे।

बांसुरी

बांसुरी घर में रखने से घर में लक्ष्मी का वास बना रहता है।इससे घर के वास्तु दोष दूर होते हैं और धन पाने के योग बनने लगते हैं।

एकाक्षी नारियल

जिस घर में एकाक्षी नारियल रखा जाता है और इसकी नियमित पूजा होती है, वहां नेगेटिविटी नहीं ठहरती है, न ही कभी धन-धान्य की कमी होती है।

घर के मंदिर में शंख

शंख में वास्तु दोष दूर करने की अद्भुत शक्ति होती है। जिस घर के पूजा स्थल में शंख की स्थापना भी की जाती है, वहां देवी लक्ष्मी स्वयं निवास करती हैं।

कुबेर की मूर्ति

भगवान कुबेर उत्तर दिशा के स्वामी माने जाते हैं, इसलिए उत्तर दिशा में इनकी मूर्ति रखने से घर में कभी पैसों की कमी नहीं होती।


To Get Fast Updates Download our Apps:Android||Telegram

Stay connected with us for latest updates

Important: Please always Check and Confirm the above details with the official website and Advertisement / Notification.

Monday, 26 May 2025

वटसावित्री व्रत धार्मिक और वैज्ञानिक ,रूप से महत्वपूर्ण त्योहार है जानिये

 वटसावित्री व्रत धार्मिक और वैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण त्योहार है:-

सनातन_हिंदू_धर्म में विवाह को सिर्फ एक त्योहार ही नहीं, बल्कि एक रस्म का दर्जा दिया जाता है। विवाह समारोह में दो आत्माएं जीवन भर साथ रहने की कामना करती हैं। यद्यपि पति की दीर्घायु की शुभकामना के साथ सुहाग की रक्षा के लिए व्रत, पूजा आदि जीवन की प्रक्रिया में शामिल हैं, वट सावित्री या बरसाइत पर्व का वैवाहिक जीवन में अपना विशेष महत्व है, वह शक्ति का प्रतीक है और वास्तविक है। पति के सुख-दुःख, यश-अपयश, लाभ-हानि में वह उसके साथ रहेगी। वह अंतिम यात्रा तक अपने हृदय में पति के सामने मृत्यु का भाव रखेगी और मां गौरी से प्रार्थना करेगी और पति का प्रेम बना रहे। दिल में।" वह किसी भी आपत्ति के सामने अपने पति को ढाल देती है। अपने पतिव्रता धर्म की शक्ति से, वह अपने मृत पति के जीवन को यम से भी वापस छीनने की क्षमता रखती है, जिसका  'वट सावित्री' का त्योहार उदाहरण है।

हिन्दू पन्चाङ के अनुसार हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या को वट-सावित्री व्रत मनाया जाता है। इसमें सुहागिन अपने पति की दीर्घायु की कामना के साथ भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी और वट वृक्ष की पूजा करती है। धार्मिक मान्यताएं प्रबल होती हैं। मान्यता है कि वट वृक्ष की पूजा से सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के साथ-साथ कष्टों का नाश होता है। हिंदू धर्म में वट वृक्ष को बेहद खास माना जाता है। मान्यता है कि वट वृक्ष में भगवान विष्णु का वास होता है। हिंदू धर्म में वट वृक्ष की पूजा और परिक्रमा करने का विधान है। आध्यात्मिक दृष्टि से वट वृक्ष को दीर्घायु और अमरत्व का प्रतीक माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि वट वृक्ष की जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखा में भगवान शिव का वास होता है। पेड़ से कई शाखाएँ निकलकर नीचे की ओर लटकती हैं जिन्हें 'सावित्रीदेवी' माना जाता है। यही वजह है कि वट वृक्ष की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं बहुत जल्दी पूरी होती हैं।

 #अग्नि_पुराण के अनुसार #बरगद का वृक्ष उत्सर्जन का प्रतीक है इसलिए महिलाएं संतान प्राप्ति के लिए भी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। #हिन्दू_धर्म इतना सहिष्णु माना जाता है कि वह सजीव, निर्जीव, प्रकृति के कण-कण का कृतज्ञ है। सूर्य, चंद्रमा, वायु, जल और पृथ्वी जो कुछ भी देते हैं, उसके प्रति एक दिव्य भाव होता है। हिंदू धर्म में ब्रह्मा, विष्णु और महेश के त्रिदेव के समान बरगद,पिपल और नीम के पेड़ के समान माना जाता है। वट वृक्ष को ब्रह्मा के समान माना जाता है और कई त्योहारों में इसकी पूजा की जाती है। भारतीय संस्कृति में वट सावित्री व्रत आदर्श स्त्रीत्व के सौभाग्य को बढ़ाने और पवित्रता के धर्म को अपनाने का विश्वास बन गया है।

इस व्रत में वट और सावित्री दोनों का ही विशेष महत्व माना जाता है। #पराशर_ऋषि के अनुसार 'वट मूले तोपवास' पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक साथ रहते हैं। इसके नीचे मूल पूजा करने से दुर्भाग्य का नाश होता है और सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। वट वृक्ष ज्ञान और निर्वाण का भी प्रतीक है। यह तथ्य है कि भगवान बुद्ध को वट वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था, इस कहावत का तत्काल प्रमाण है। पुराणों में यह भी वर्णित है कि जब पूरी पृथ्वी कल्प या प्रलय में डूब गई थी, तब केवल वट वृक्ष ही बचा था। अक्षय वट कहे जाने वाले इस पेड़ की पत्तियों पर भगवान शिशु रूप में सृष्टि और अनंत काल के रहस्य को देखते हैं।

#महाकवि_कालिदास के महाकाव्य "#रघुवंशम" और चीनी यात्री 'ह्वेनसांग' के यात्रा वृत्तांत में भी अक्षय वट का प्रसंग महत्वपूर्ण है। अक्षय वट को आज भी प्रयाग में त्रिवेणी के तट पर स्थित माना जाता है। इसी तरह जैन और बौद्ध भी इसे बहुत पवित्र मानते हैं। कहा जाता है कि अक्षयवट के बीज महात्मा बुद्ध ने प्रयाग में बोए थे। इसी तरह, जैन तीर्थंकर ऋषभदेव ने अक्षय वट के नीचे तपस्या की, जिसे प्रयाग में ऋषभदेव तपो स्थल के रूप में जाना जाता है। बनारस और गया में कई वट वृक्ष हैं जिनकी अखूट वट के रूप में पूजा की जाती है। कुरुक्षेत्र के पास ज्योतिसर नामक स्थान पर, एक वट वृक्ष है, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह सुदर्शन चक्र धारण करने वाले भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए गीता उपदेश का साक्षी है।

इसी प्रकार ज्योतिषीय दृष्टि से वट वृक्ष को मघा नक्षत्र का प्रतीक माना गया है।मघा नक्षत्र में जन्म लेने वालों को वट वृक्ष की पूजा करनी चाहिए और वट वृक्ष लगाना चाहिए। शास्त्रों में वट वृक्ष को अमर माना गया है। वृक्ष की उत्पत्ति से संबंधित कथा वामन पुराण में बहुत प्रचलित है। कहा जाता है कि आश्विन मास में जब विष्णु की नाभि से कमल प्रकट हुआ तो अन्य देवताओं से भी अनेक वृक्ष उत्पन्न हुए। उस समय यक्षों के राजा मणिभद्र से वट वृक्ष का जन्म हुआ। यक्षों से घनिष्ठ सम्बन्ध होने के कारण ये यक्षव, यक्षतरु, यक्ष्वारुक आदि नामों से प्रसिद्ध हैं।

इसी प्रकार #रामायण में 'सुभद्रावत' नामक वट वृक्ष का वर्णन मिलता है। जिसकी टहनियों को गरुड़ ने तोड़ा था। रामायण में अक्षय वट की कथा भी बहुत प्रचलित है। वाल्मीकि रामायण में भी इसे 'श्यामण्यग्रोध' कहा गया है। यमुना के किनारे का वट अत्यंत विशाल था और उसकी छाया में घना अँधेरा मीलों तक फैल गया था। जिसने उन्हें 'श्यामण्योगढ़' नाम दिया राम, लक्ष्मण और सीता ने अपनी वन यात्रा के दौरान वट वृक्ष को प्रणाम किया और यमुना को पार करने के लिए आगे बढ़े।

ऐसा माना जाता है कि देवी सावित्री ने ज्येष्ठ माह की अमावस्या के दिन वट वृक्ष की छाया में अपने पति को जीवित कर दिया था। तभी से इस दिन सुहागिन स्त्रियों के लिए वट वृक्ष की पूजा विशेष हो गई। हिंदू धर्म का पालन करते हुए, महिलाएं अपने अपरिवर्तनीय और अखंड विवाह की रक्षा के लिए वट वृक्ष के नीचे पूजा, आरती, वन्दना और कथा श्रवण करती है।

संकलन संपादन ✍️ माँ भगवती बालसंस्कारशाला                


To Get Fast Updates Download our Apps:Android||Telegram

Stay connected with us for latest updates

Important: Please always Check and Confirm the above details with the official website and Advertisement / Notification.

Monday, 13 January 2025

जानिए क्या है उत्तरायण-प्रति वर्ष मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण होता है

 क्या होता है सूर्य उत्तरायण

प्रति वर्ष मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण होता है, यानी दक्षिण से उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू होता है। इससे रातें छोटी व दिन बड़े होने लगते हैं। धर्म ग्रंथों में उत्तरायण को देवताओं का दिन भी कहते हैं।

क्या है उत्तरायण

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सूर्य 30-31 दिनों में राशि परिवर्तन करता है। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना गया है। मकर संक्रांति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध में होता है अर्थात् भारत से दूर (भारत उत्तरी गोलार्द्ध में है)। इस समय सूर्य दक्षिणायन होता है। इसी कारण यहां रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं तथा सर्दी का मौसम होता है। मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं व गर्मी का मौसम शुरू हो जाता है। इसे उत्तरायण कहते हैं।

शुभ होता है सूर्य का उत्तरायण होना.

धर्म ग्रंथों के अनुसार सूर्य एक सौर वर्ष (365 दिन) में क्रमानुसार 12 राशियों में भ्रमण करता है। जब सूर्य किसी राशि में प्रवेश करता है तो उसे संक्रांति कहते हैं। जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है तो मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। सूर्य का मकर राशि में जाना बहुत ही शुभ माना जाता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रांति से ही देवताओं का दिन शुरू होता है, जिसे उत्तरायण कहते हैं।

इसलिए उत्तरायण को कहते हैं देवताओं का दिन

धर्मग्रंथों में उत्तरायण को देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा गया है। शास्त्रों में उत्तरायण को सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। इसीलिए ये समय जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि के लिए विशेष है। मकर संक्रांति पर सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना जाता है। ऐसा जानकर संपूर्ण भारत में लोगों द्वारा विविध रूपों में सूर्यदेव की उपासना व पूजा कर, उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है।

सूर्य की गति से संबंधित होने के कारण यह पर्व हमारे जीवन में गति, नव चेतना, नव उत्साह और नव स्फूर्ति का प्रतीक है क्योंकि यही वो कारक है जिनसे हमें जीवन में सफलता मिलती है। उत्तरायण का महत्व इसी तथ्य से स्पष्ट होता है कि हमारे ऋषि-मुनियों ने इस अवसर को अत्यंत शुभ और पवित्र माना है। उपनिषदों में इस पर्व को ‘देव दान’ भी कहा गया है।

भीष्म ने किया था सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार..............

उत्तरायण को हिंदू धर्म में बहुत ही पवित्र समय माना गया है। महाभारत में भी कई बार उत्तरायण शब्द का उल्लेख आया है। सूर्य के उत्तरायण होने का महत्व इसी कथा से स्पष्ट है कि बाणों की शैया पर लेटे भीष्म पितामह अपनी मृत्यु को उस समय तक टालते रहे, जब तक कि सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण नहीं हो गया। सूर्य के उत्तरायण होने के बाद ही उन्होंने अपने प्राण त्यागे।

स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायण का महत्व बताते हुए गीता में कहा है कि जब सूर्यदेव उत्तरायण होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। इसके विपरीत सूर्य के दक्षिणायण होने पर पृथ्वी अंधकारमय होती है और इस अंधकार में शरीर त्याग करने पर पुनर्जन्म लेना पड़ता है


To Get Fast Updates Download our Apps:Android||Telegram

Stay connected with us for latest updates

Important: Please always Check and Confirm the above details with the official website and Advertisement / Notification.

Thursday, 7 November 2024

संत श्री जलाराम बापा का जीवन चरित्र जाने

 संत श्री जलाराम बापा जयंती 

➡ 08 नवम्बर 2024 शुक्रवार को संत श्री जलाराम बापा जयंती है ।

जलाराम बापा का जन्म सन्‌ 1799 में गुजरात के राजकोट जिले के वीरपुर गॉंव में हुआ था। उनके पिता का नाम प्रधान ठक्कर और मॉं का नाम राजबाई था। बापा की माँ एक धार्मिक महिला थी, जो साधु-सन्तों की बहुत सेवा करती थी। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर संत रघुवीर दास जी ने आशीर्वाद दिया कि उनका दुसरा प़ुत्र जलाराम ईश्वर तथा साधु-भक्ति और सेवा की मिसाल बनेगा।

 16 साल की उम्र में श्री जलाराम का विवाह वीरबाई से हुआ। परन्तु वे वैवाहिक बन्धन से दूर होकर सेवा कार्यो में लगना चाहते थे। जब श्री जलाराम ने तीर्थयात्राओं पर निकलने का निश्चय किया तो पत्नी वीरबाई ने भी बापा के कार्यो में अनुसरण करने में निश्चय दिखाया। 18 साल की उम्र में जलाराम बापा ने फतेहपूर के संत श्री भोजलराम को अपना गुरू स्वीकार किया। गुरू ने गुरूमाला और श्री राम नाम का मंत्र लेकर उन्हें सेवा कार्य में आगे बढ़ने के लिये कहा, तब जलाराम बापा ने ‘सदाव्रत’ नाम की भोजनशाला बनायी जहॉं 24 घंटे साधु-सन्त तथा जरूरतमंद लोगों को भोजन कराया जाता था। इस जगह से कोई भी बिना भोजन किये नही जा पाता था। वे और वीरबाई मॉं दिन-रात मेहनत करते थे।

बीस वर्ष के होते तक सरलता व भगवतप्रेम की ख्याति चारों तरफ फैल गयी। लोगों ने तरह-तरह से उनके धीरज या धैर्य, प्रेम प्रभु के प्रति अनन्य भक्ति की परीक्षा ली। जिन पर वे खरे उतरे। इससे लोगों के मन में संत जलाराम बापा के प्रति अगाध सम्मान उत्पन्न हो गया। उनके जीवन में उनके आशीर्वाद से कई चमत्कार लोगों ने देखें। जिनमे से प्रमुख बच्चों की बीमारी ठीक होना व निर्धन का सक्षमता प्राप्त कर लोगों की सेवा करना देखा गया। हिन्दु-मुसलमान सभी बापा से भोजन व आशीर्वाद पाते। एक बार तीन अरबी जवान वीरपुर में बापा के अनुरोध पर भोजन किये, भोजन के बाद जवानों को शर्मींदगी लगी, क्योंकि उन्होंने अपने बैग में मरे हुए पक्षी रखे थे। बापा के कहने पर जब उन्होंने बैग खोला, तो वे पक्षी फड़फड़ाकर उड़ गये, इतना ही नही बापा ने उन्हें आशीर्वाद देकर उनकी मनोकामना पूरी की। सेवा कार्यो के बारे में बापा कहते कि यह प्रभु की इच्छा है। यह प्रभु का कार्य है। प्रभु ने मुझे यह कार्य सौंपा है इसीलिये प्रभु देखते हैं कि हर व्यवस्था ठीक से हो सन्‌ 1934 में भयंकर अकाल के समय वीरबाई मॉं एवं बापा ने 24 घंटे लोगों को खिला-पिलाकर लोगों की सेवा की। सन्‌ 1935 में माँ ने एवं सन्‌ 1937 में बापा ने प्रार्थना करते हुए अपने नश्वर शरीर को त्याग दिया।

 आज भी जलाराम बापा की श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करने पर लोगों की समस्त इच्छायें पूर्ण हो जाती है। उनके अनुभव ‘पर्चा’ नाम से जलाराम ज्योति नाम की पत्रिका में छापी जाती है। श्रद्धालुजन गुरूवार को उपवास कर अथवा अन्नदान कर बापा को पूजते हैं।



To Get Fast Updates Download our Apps:Android||Telegram

Stay connected with us for latest updates

Important: Please always Check and Confirm the above details with the official website and Advertisement / Notification.

Thursday, 10 October 2024

नवरात्रि के आठवें दिन मां दुर्गा का आठवां रूप माता महागौरी की पूजा की जाती है जानिये

 नवरात्रि के आठवें दिन मां दुर्गा का आठवां रूप माता महागौरी की पूजा की जाती है। माता अपने भक्तों के भीतर पल रही बुराइयों को मिटाकर उनको सद्बुद्धि व ज्ञान की ज्योति जलाती है। मां महागौरी की आराधना करने से व्यक्ति को आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है और उसके भीतर श्रद्धा विश्वास व निष्ठा की भावना को बढ़ाता है।

माता महागौरी, मां दुर्गा की अष्टम शक्ति है जिसकी आराधना करने से भक्तजनों को जीवन की सही राह का ज्ञान होता है और जिस पर चलकर लोग अपने जीवन का सार्थक बना सकते हैं। जो भी साधक नवरात्रि में माता के इस रूप की आराधना करते हैं माँ उनके समस्त पापों का नाश करती है। अस्टमी के दिन व्रत रहकर मां की पूजा करते हैं और उसे भोग लगाकर मां का प्रसाद ग्रहण करते हैं, इससे व्यक्ति के अन्दर के सारे दुष्प्रभाव नष्ट हो जाते हैं।

नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की आराधना से साधक के समस्त पापों का नाश होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, गौर वर्ण प्राप्त करने के लिए मां ने बहुत कठिन तपस्या की थी। मां महागौरी की उत्पत्ति के समय इनकी आयु मात्र आठ वर्ष की थी, इसी कारण से माता का पूजन अष्टमी के दिन किया जाता है। मां अपने सभी भक्तों के लिए अन्नपूर्णा स्वरूप है। अष्टमी के ही दिन कन्याओं के पूजन का विधान है। मां महागौरी धन, वैभव, तथा सुख-शांति की अधिष्ठात्री देवी हैं।

मां का स्वरूप शंख, चन्द्र व कुंद के फूल के समान उज्जवल है। मां वृषभ (बैल) की सवारी करती हैं तथा माता शांति स्वरूपा हैं। कहा जाता है कि मां ने भगवन शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए बहुत कठोर तपस्या की थी जिसके कारण उनका सम्पूर्ण शरीर मिट्टी से ढक गया था। भगवान महादेव माँ की तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी पत्नी होने का वरदान दिया। भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगाजल से धोया जिसके बाद मां गौरी का शरीर विद्युत के समान गौर व उज्जवल हो गया। कहते हैं इसी कारण इनका नाम महागौरी पड़ा।

माता की चार भुजाएं हैं जिनमें से दो अभयमुद्रा और वरमुद्रा में हैं तथा दो में त्रिशूल और डमरू धारण किया हुआ है। अपने सभी रूपों में से महागौरी, माँ दुर्गा का सबसे शांत रूप है। मां महागौरी को संगीत व गायन बहुत अच्छा लगता है इसलिए माता के पूजन में संगीत अवश्य होता है। कहा जाता है कि आज के दिन जो भक्त कन्याओं को भोजन कराकर उनका आर्शीवाद लेते हैं, मां उन्हें आर्शीवाद अवश्य देती है तथा उनका जीवन खुशियों से भर देती हैं। हिन्दू धर्म में अष्टमी के दिन कन्याओं को भोजन कराए जाने की परम्परा है।

ध्यान मंत्र

                " श्वेत वृषे समारूढ़ा श्वेतांबरधरा शुचि।

                  महागौरी शुभे दद्यान्महादेव प्रमोददा।। "



To Get Fast Updates Download our Apps:Android||Telegram

Stay connected with us for latest updates

Important: Please always Check and Confirm the above details with the official website and Advertisement / Notification.

Wednesday, 25 September 2024

जीवीत्पुत्रीका व्रत–2024 -जितिया सम्पूर्ण पूजन विधि-जीतिया व्रत कथाएँ-जीमूतवाहन की कथा-चिल्हो-सियारो की कथा-

 .                        (जीवीत्पुत्रीका व्रत–2024)

        बुधवार दिनांक 25 सितम्बर 2024 तदनुसार संवत् २०८१ अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आने वाला व्रत–

          हिन्दू पंचांग के अनुसार, हर साल आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, 24 सितम्बर को सूर्योदय के उपरांत दोपहर 12:39 पर अष्टमी तिथि प्रारम्भ हो रही है और 25 सितम्बर को दोपहर 12 बजकर 10 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार, जीवित्पुत्रिका व्रत 25 सितम्बर को रखा जाएगा। 24 सितम्बर मंगलवार को नहाए-खाय होगा। 25  सितम्बर बुधवार को निर्जला व्रत रखा जाएगा। 26 सितम्बर गुरुवार को सूर्योदय के बाद व्रत पारण किया जाएगा।

                           जीवीत्पुत्रीका व्रत

          जीवित्पुत्रिका व्रत को जितिया या जिउतिया व्रत भी कहा जाता है। सुहागिन स्त्रियां इस दिन निर्जला उपवास करती हैं। महिलाएँ अपनी सन्तान की लम्बी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए इस व्रत को रखती हैं। यह व्रत मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखण्ड के कई क्षेत्रों में किया जाता है। 

          उत्तर पूर्वी राज्यों में जीवित्पुत्रिका व्रत बहुत लोकप्रिय है। इस जीवीत्पुत्रीका (जीतिया) व्रत के नियम बेहद कठिन होते हैं। जितिया व्रत तीन दिनों तक चलता है। पहला दिन नहाए-खाए, दूसरा दिन जितिया निर्जला व्रत और तीसरे दिन पारण किया जाता है।

                     “जितिया सम्पूर्ण पूजन विधि”

01. स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

02. भगवान जीमूतवाहन की पूजा करें।

03. भगवान जीमूतवाहन की कुशा से निर्मित प्रतिमा को धूप-दीप, चावल, पुष्प आदि अर्पित करें।

04. मिट्टी तथा गाय के गोबर से चील व सियारिन की मूर्ति बनाएं।

05. इनके माथे पर लाल सिन्दूर का टीका लगाएं।

06. जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा कहें या सुनें।

07. माँ को 16 पेड़ा, 16 दूब की माला, 16 खड़ा चावल, 16 गांठ का धागा, 16 लौंग, 16 इलायची, 16 पान, 16 खड़ी सुपारी व श्रृंगार का सामान अर्पित करें।

08. वंश की वृद्धि और प्रगति के लिए उपवास कर बांस के पत्रों से पूजन करें

                            “जीतिया व्रत कथाएँ”

          पार्वतीजी ने एक स्थान पर स्त्रियों को विलाप करते देखा तो शिवजी से उसका कारण पूछा। शिवजी ने बताया–‘इन स्त्रियों के पुत्रों का निधन हो गया है इसलिए ये विलाप कर रही हैं।’

          पार्वतीजी बहुत दुःखी हो गईं। उन्होंने कहा–‘हे नाथ एक माता के लिए इससे अधिक हृदय विदारक बात क्या हो सकती है कि उसके सामने उसका पुत्र मर जाए। इससे मुक्ति का कोई तो मार्ग हो, कृपया बतायें।’

          शिवजी ने कहा–‘हे देवी जो विधाता द्वारा रचित है उसमें हेर-फेर नहीं हो सकता किन्तु जीमूतवाहन की पूजा से माताएँ अपनी सन्तान पर आए प्राणघाती संकटों को भी टाल सकती हैं।

          जो माता आश्विन मास की कृष्णपक्ष की अष्टमी को जीमूतवाहन की पूजा विधि-विधान से करेगी उसकी सन्तान के संकटों का नाश होगा।’

          पार्वतीजी के अनुरोध पर शिवजी ने उन मृत बालकों को पुनः जीवित कर दिया। इस कारण ही इसे जीवितपुत्रिका व्रत कहा जाता है।

          जीमूतवाहन की कथा ही मुख्य रूप से सुनी जाती है किन्तु आंचलिक क्षेत्रों में कई कथाएँ प्रचलित हैं जिसमें चिल्हो-सियारो की कथा भी है। आपको जीवितपुत्रिका की संक्षिप्त व्रत कथा सुनाते हैं।

                             “जीमूतवाहन की कथा”

          गन्धर्वों के राजकुमार का नाम जीमूतवाहन था। वे बडे उदार और परोपकारी थे। जीमूतवाहन के पिता ने वृद्धावस्था में वानप्रस्थ आश्रम में जाते समय इनको राजसिंहासन पर बैठाया किन्तु इनका मन राज-पाट में नहीं लगता था।

          वह राज्य का भार अपने भाइयों पर छोडकर स्वयं वन में पिता की सेवा करने चले गए। वन में ही जीमूतवाहन को मलयवती नामक राजकन्या से भेंट हुई और दोनों में प्रेम हो गया।

          एक दिन जब वन में भ्रमण करते हुए जीमूतवाहन काफी आगे चले गए, तब उन्हें एक वृद्धा विलाप करते हुए दिखी। पूछने पर वृद्धा ने रोते हुए बताया–‘मैं नागवंश की स्त्री हूँ। मुझे एक ही पुत्र है। पक्षीराज गरुड के कोप से मुक्ति दिलाने के लिए नागों ने यह व्यवस्था की है वे गरूड को प्रतिदिन भक्षण हेतु एक युवा नाग सौंपते हैं।

          आज मेरे पुत्र शंखचूड की बलि का दिन है। आज मेरे पुत्र के जीवन पर संकट है और थोड़ी देर बाद ही मैं पुत्रविहीन हो जाऊँगी। एक स्त्री के लिए इससे बड़ा दुख क्या होगा कि उसके जीते जी उसका पुत्र न रहे।’

          जीमूतवाहन को यह सुनकर बड़ा दुख हुआ। उन्होंने उस वृद्धा को आश्वस्त करते हुए कहा–‘डरो मत। मैं तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा करूँगा। आज उसके स्थान पर स्वयं मैं अपने आपको उसके लाल कपडे में ढ़ककर वध्य-शिला पर लेटूँगा ताकि गरूड मुझे खा जाए पर तुम्हारा पुत्र बच जाए।’

          इतना कहकर जीमूतवाहन ने शंखचूड के हाथ से लाल कपडा ले लिया और वे उसे लपेटकर गरुड को बलि देने के लिए चुनी गई वध्य-शिला पर लेट गए। नियत समय पर गरुड बडे वेग से आए और वे लाल कपडे में ढ़के जीमूतवाहन को पंजे में दबोचकर पहाड के शिखर पर जाकर बैठ गए।

          गरूड़ ने अपनी कठोर चोंक का प्रहार किया और जीमूतवाहन के शरीर से मांस का बड़ा हिस्सा नोच लिया। इसकी पीड़ा से जीमूतवाहन की आँखों से आँसू बह निकले और वह दर्द से कराहने लगे।

          अपने पंजे में जकड़े प्राणी की आँखों में से आँसू और मुँह से कराह सुनकर गरुड़ बडे आश्चर्य में पड गए क्योंकि ऐसा पहले कभी न हुआ था। उन्होंने जीमूतवाहन से उनका परिचय पूछा। जीमूतवाहन ने सारा किस्सा कह सुनाया कि कैसे एक स्त्री के पुत्र की रक्षा के लिए वह अपने प्राण देने आए हैं। आप मुझे खाकर भूख शांत करें।

          गरुड उनकी बहादुरी और दूसरे की प्राणरक्षा के लिए स्वयं का बलिदान देने की हिम्मत से बहुत प्रभावित हुए। उन्हें स्वयं पर पछतावा होने लगा। 

          वह सोचने लगे कि ‘एक यह मनुष्य है जो दूसरे के पुत्र की रक्षा के लिए स्वयं की बलि दे रहा है और एक मैं हूँ जो देवों के संरक्षण में हूँ किन्तु दूसरों की सन्तान की बलि ले रहा हूँ।’ उन्होंने जीमूतवाहन को मुक्त कर दिया।

          गरूड ने कहा–‘हे उत्तम मनुष्य मै, तुम्हारी भावना और त्याग से बहुत प्रसन्न हूँ। मैंने तुम्हारे शरीर पर जो घाव किए हैं उसे ठीक कर देता हूँ। तुम अपनी प्रसन्नता के लिए मुझसे कोई वरदान मांग लो।’

          राजा जीमूतवाहन ने कहा–‘हे पक्षीराज ! आप तो सर्वसमर्थ हैं। यदि आप प्रसन्न हैं और वरदान देना चाहते हैं तो आप सर्पों को अपना आहार बनाना छोड़ दें। आपने अब तक जितने भी प्राण लिए हैं उन्हें जीवन प्रदान करें।’

          गरुड ने सबको जीवनदान दे दिया तथा नागों की बलि न लेने का वरदान भी दिया। इस प्रकार जीमूतवाहन के साहस से नाग-जाति की रक्षा हुई। 

          गरूड़ ने कहा–‘तुम्हारी जैसी इच्छा वैसा ही होगा। हे राजा! जो स्त्री तुम्हारे इस बलिदान की कथा सुनेगी और विधिपूर्वक व्रत का पालन करेगी उसकी सन्तान मृत्यु के मुख से भी निकल आएगी।’

          तब से ही पुत्र की रक्षा हेतु जीमूतवाहन की पूजा की प्रथा शुरू हो गई।

          यह कथा कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर ने माता पार्वती को सुनाई थी। जीवित पुत्रिका के दिन भगवान श्रीगणेश, माता पार्वती और शिवजी की पूजा एवं ध्यान के बाद ऊपर बताई गई व्रत कथा भी सुननी चाहिए।

          इसकी पूजा शिवजी को प्रिय प्रदोषकाल में करनी चाहिए। व्रत का पारण दूसरे दिन अष्टमी तिथि की समाप्ति के पश्चात किया जाता है।

                           “चिल्हो-सियारो की कथा”

          नर्मदा नदी के पास एक नगर था कंचनबटी। उस नगर के राजा का नाम मलयकेतु था। नर्मदा नदी के पश्चिम में बालुहटा नाम की मरुभूमि थी, जिसमें एक विशाल पाकड़ के पेड़ पर एक चील रहती थी। उसे पेड़ के नीचे एक सियारिन भी रहती थी। दोनों पक्की सहेलियां थीं। 

          दोनों ने कुछ महिलाओं को देखकर जितिया व्रत करने का संकल्प लिया और दोनों ने भगवान श्री जीऊतवाहन की पूजा और व्रत करने का प्रण ले लिया। लेकिन जिस दिन दोनों को व्रत रखना था, उसी दिन शहर के एक बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गई और उसका दाह संस्कार उसी मरुस्थल पर किया गया। 

          सियारिन को अब भूख लगने लगी थी। मुर्दा देखकर वह खुद को रोक न सकी और उसका व्रत टूट गया। पर चील ने संयम रखा और नियम व श्रद्धा से अगले दिन व्रत का पारण किया। “श्रीजी की चरण सेवा” की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ के साथ जुड़े रहें तथा अपने सभी भगवत्प्रेमी मित्रों को भी आमंत्रित करें। अब आप हमारे पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी पा सकते हैं, लिंक हमारी फेसबुक प्रोफाइल पर देखें। अगले जन्म में दोनों सहेलियों ने ब्राह्मण परिवार में पुत्री के रूप में जन्म लिया। उनके पिता का नाम भास्कर था। चील, बड़ी बहन बनी और उसका नाम शीलवती रखा गया। 

          शीलवती की शादी बुद्धिसेन के साथ हुई। सियारन, छोटी बहन के रूप में जन्मी और उसका नाम कपुरावती रखा गया। उसकी शादी उस नगर के राजा मलायकेतु से हुई। 

          अब कपुरावती कंचनबटी नगर की रानी बन गई। भगवान जीऊतवाहन के आशीर्वाद से शीलवती के सात बेटे हुए। पर कपुरावती के सभी बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे। 

          कुछ समय बाद शीलवती के सातों पुत्र बड़े हो गए। वे सभी राजा के दरबार में काम करने लगे। कपुरावती के मन में उन्हें देख ईर्ष्या की भावना आ गयी। 

          उसने राजा से कहकर सभी बेटों के सर काट दिए। उन्हें सात नए बर्तन मंगवाकर उसमें रख दिया और लाल कपड़े से ढककर शीलवती के पास भिजवा दिया। 

          यह देख भगवान जीऊतवाहन ने मिट्टी से सातों भाइयों के सर बनाए और सभी के सिर को उसके धड़ से जोड़कर उन पर अमृत छिड़क दिया। इससे उनमें जान आ गई। 

          सातों युवक जिन्दा हो गए और घर लौट आए। जो कटे सर रानी ने भेजे थे वे फल बन गए। दूसरी ओर रानी कपुरावती, बुद्धिसेन के घर से सूचना पाने को व्याकुल थी। जब काफी देर सूचना नहीं आई तो कपुरावती स्वयं बड़ी बहन के घर गयी। 

          वहाँ सबको जिंदा देखकर वह सन्न रह गयी। जब उसे होश आया तो बहन को उसने सारी बात बताई। अब उसे अपनी गलती पर पछतावा हो रहा था। 

          भगवान जीऊतवाहन की कृपा से शीलवती को पूर्व जन्म की बातें याद आ गईं। वह कपुरावती को लेकर उसी पाकड़ के पेड़ के पास गयी और उसे सारी बातें बताईं। 

          कपुरावती बेहोश हो गई और मर गई। जब राजा को इसकी खबर मिली तो उन्होंने उसी जगह पर जाकर पाकड़ के पेड़ के नीचे कपुरावती का दाह-संस्कार कर दिया !


To Get Fast Updates Download our Apps:Android||Telegram

Stay connected with us for latest updates

Important: Please always Check and Confirm the above details with the official website and Advertisement / Notification.

Weekly Popular Updates

Gujarati Recipe

Gujarati Recipe
Gujarati food recipe best idea
html script

Popular Posts

Catagerios

Our Followers

Any Problem Or Suggestion Please Submit Here

Name

Email *

Message *