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Monday, 16 December 2024

ऋषि दुर्वासा और 'इनके पत्नी कंदली' की कहानी केले के पेड़की कथा

 

केले के पेड़ के उत्पन्न होनेकी कहानी बहुत ही रोचक है, जो कि ऋषि दुर्वासा के क्रोध से जुड़ी हुई है!ऋषि दुर्वासा के क्रोध का परिणाम है केले का पेड़ ऋषि पत्नी कंदली के भस्म होने से उत्पन्न हुआ केला! पूजा व्रत विधान में केले का फल प्रसाद में, केले के पत्ते पूजा स्थल को सजाने में और केले का पौधा किसी भी स्थान को पूजा स्थल की मान्यता देने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है.!आरोग्य की नजर में भी संपूर्ण आहार वाला फल केला है, आध्यात्म की नजर में भी बहुत पवित्र और पूजनीय है. इसके चौड़े पत्तों में श्रीहरि का वास माना जाता है तो जड़ों में महादेव का जिसे मूल शंकर कहते हैं. !कैसे हुआ इसका जन्म, पुराणों में इसकी कथा भी बहुत रोचक है. !इसका वर्णन पुराण कथा में मिलता है, जिसका संबंध सबसे क्रोधी ऋषि दुर्वासा से है. !एक कथा के अनुसार महर्षि अत्रि और अनुसूया के पुत्र दुर्वासा बहुत ही क्रोधी स्वभाव के थे. लेकिन उनके अंदर ऋषि संस्कार बचपन से ही प्रबल थे और वह 5 वर्ष की अवस्था आते-आते ध्यान-साधना में लीन रहने लगे थे. दरअसल दुर्वासा खुद महादेव के क्रुद्ध स्वरूप रुद्र के अंश से उत्पन्न हुए थे.!क्रोध ही उनके स्वभाव का मूल था और वह तमाम ज्ञान को पाने के बाद भी इसे नहीं त्याग सके थे. बड़े होते-होते जब माता-पिता ने देखा कि बालक के अंदर वैराग्य अधिक उत्पन्न हो रहा है और वह समाज की व्यवहारिकता को नहीं समझ रहा है तब उन्होंने उनका विवाह ऋषि अंबरीष की कन्या से करा दिया.!ऋषि अंबरीष ने अपनी कन्या के कई गुण बताए और ऋषि दुर्वासा ने माता-पिता की आज्ञा मानकर विवाह कर लिया. ऋषि अंबरीष दुर्वासा की क्रोधाग्नि को जानते थे, इसलिए पुत्री के साथ कोई अनिष्ट न हो इसके लिए भी चिंतित थे. !उन्होंने ऋषि दुर्वासा से पत्नी से कोई भूल हो जाए तो उसे क्षमा कर दिए जाने की प्रार्थना की. तब ऋषि ने उन्हें वचन दिया कि वह अपनी पत्नी के 100 अपराध क्षमा करते रहेंगे. !स्वाभाविक है गृहस्थ जीवन में कुछ बातें ऊपर-नीचे तो होती ही रहती हैं. ऋषि दुर्वासा की पत्नी का नाम था कंदली, जो कि स्वभाव से कर्मठ और बहुत समझदार थीं. वह हर एक बात का ख्याल रखती थीं. किन्तु फिर भी कभी-कभी कुछ न कुछ हो ही जाता था, लेकिन ऋषि ने उन पर कभी क्रोध नहीं किया.उनका मूल स्वभाव जानकर ऋषि उन्हें क्षमा कर देते थे, ऐसा होने से धीरे-धीरे कंदली के स्वभाव में भी निश्चिंतता आने लगी. !लेकिन एक दिन ऋषि दुर्वासा कहीं से प्रवास कर कुछ देरी से आए. रात में भोजन के बाद उन्होंने विश्राम के लिए कहा साथ ही पत्नी से कहा कि मुझे कल ब्रह्म मुहूर्त में जरूर उठा दें. मैं खुद भी कोशिश करूंगा, लेकिन थकान के कारण शायद ऐसा संभव न हो. ब्रह्म मुहूर्त में ऋषिवर को जरूरी अनुष्ठान करना था. !अगली सुबह कंदली की ब्रह्म मुहूर्त में नींद तो खुली, लेकिन आलस के कारण न तो वह खुद उठीं और न हीं ऋषि को उठाया. 

सुबह सूर्योदय के बाद जब ऋषि की आंख खुली तो दिन चढ़ आया था. अपना अनुष्ठान न कर पाने के कारण वह कंदली पर बहुत क्रोधित हुए और उन्हें भस्म हो जाने का श्राप दे दिया. !ऋषि के श्राप का तुरंत असर हुआ और देवी कंदली राख बनकर रह गई. ऋषि को भी इस घटना पर बहुत दुख हुआ, लेकिन अनुशासन स्थापित करने के लिए उन्हें ऐसा करना पड़ा. जब कंदली के पिता ऋषि अंबरीष आए तो अपनी पुत्री को राख बना देखकर बहुत दुखी हुए.तब दुर्वासा ऋषि ने कंदली की राख को पेड़ में बदल दिया और वरदान दिया कि अब से यह हर पूजा व अनुष्ठान में इनका प्रयोग होगा इस तरह से केले के पेड़ का जन्म हुआ और (कदलीफल) यानी केले का फल हर पूजा का प्रसाद बन गया. केले के पेड़ का आध्यात्मिक दृष्टि से भी बहुत महत्व है, इसे भगवान विष्णु का स्वरूप माना जाता है,ऋषि दुर्वासा क्रोधी अवश्य थे, किन्तु यह उनके प्रेम की पराकाष्ठा ही थी जो कि देवी कंदली को सदा-सदा के लिए अमर कर दिया !!

🙏🌺हर हर महादेव,,🌺🙏


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Friday, 13 September 2024

विश्व में पहेचाना जाता है भारत देश अपनी भारतीय संस्कृति के लिए जानिए

भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति है जो लगभग ५००० हजार वर्ष पुरानी है। विश्व की पहली और महान संस्कृति के रुप में भारतीय संस्कृति को माना जाता है | पुरे विश्व में भारत देश अपनी संस्कृति के लिए पहचाना जाता है | भारतीय संस्कृति को विश्व की सभी संस्कृतियो की जननी कहा जाता है |भारतीय संस्कृति में पहेले धर्मं की संस्कृति को जाना जाता है | भारत देश बिनसांप्रदायिक देश है| इस देश की सबसे बड़ी संस्कृती में ये बात आती है | बिनसांप्रदायिक का अर्थ होता है सभी धर्मं के लोग को रहेने का अधिकार और कोई भी धर्मं अपनाने का अधिकार |भारत देश में हिन्दू,मुस्लिम,शिख,पारशी,इसाई, जैन सभी धर्मो के लोग हिल मिल कर रहेते है और एक दुशरे से कदम से कदम मिलकर चलते है |भारत देश में बड़े बड़े संत महात्मा और रिशिमुनियो, ने हमें धर्मं ग्रन्थ, वेद, उपनिषद, पूरण,श्रीमद भगवद जैस धर्मं ग्रन्थ, और सभी धर्मो के धर्मं ग्रन्थ की बहुत ही बड़ी भेट दी है , जिससे हमें अच्छे और सरल जीवन जीने के तरीके सिख सखते है |



भारत देश पर मुघलो , अंग्रेजो ,राजपूतो जैसे अनेको ने राज किया और उन्होंने ऐसे ऐसे इमारतों और ग्रंथो की रचना की की आधुनिक समय में हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते | उससे पहले कहा जाता है की सतयुग में भगवान ने भी इस भारत देश की धरती पर अवतार लिए है | किसी भी देश की संस्कृति में ऐसी बात नहीं लिखी होती जो भारतीय संस्कृति का एक हिस्सा है | इस देश में श्रीराम,श्री कृष्ण,संत कबीर,महमद साहेब पयगम्बर, गुरु गोविंद ,शंकर पार्वती ,अल्लाह, प्रभु इशु, जैसे भगवन को पूंजा जाता है | भारत देश सम्राट अशोक, छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप,रानी लक्ष्मी बाई,पन्ना धाइ , सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे वीर की भूमि है | स्वामी विवेकानंद ,राज राम मोहनराइ ,महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरु, जैसे देश सेवको ने इस देश की संस्कृति को बचाने के लिए अपने प्राण तक दाव पर लगा दिए | 

भारतीय संस्कृति आज भी हमें धर्म का ज्ञान,रीती रिवाजो,जीवन जीने के निजी तरीके,मान सन्मान,त्याग,बलिदान, हिलमिल कर रहना , सत्य , अहिंसा, जरूरत मंदों कि मदद करना जैसे मूल्यों को सिखाती है | आज भी सरे विश्वके लोगो ने भारतीय संस्कृति को अपनाया है |भारतीय संस्कृति में स्त्री को बहुत मन सन्मान दिया जाता है और घर की इज्जत माना जाता है | हिन्दू धर्म में गृह लक्ष्मी माना जाता है | भारत में दिन सूर्य नमस्कार के साथ शुरु होता है | इसमें लोग सूर्य को जल चढ़ाते हैं और मंत्र पढ़कर प्रार्थना करते हैं | भारतीय लोग प्रकृति की पूजा करते हैं और यह इस संस्कृति की अनूठी बात है| हिंदू धर्म में पेड़ों और जानवरों को भगवान की तरह पूजा जाता है | लोग भगवान में विश्वास रखते हैं और कई त्यौहारों पर उपवास रखते हैं| वे सुबह का ताज़ा खाना गाय को और रात का आखिरी खाना कुत्ते को देते हैं | दुनिया में कहीं भी इस तरह की उदारता नहीं देखी जाती |


हमारे राष्ट्र की ये महान संस्कृति है कि हम बहुत खुशी के साथ अपने घर आये मेहमानों की सेवा करते है क्योंकि मेहमान भगवान का रुप होता है इसी वजह से भारत में “अतिथि देवो भव:” का कथन बेहद प्रसिद्ध है| हमारी संस्कृति की मूल जड़ इंसानियत और आध्यात्मिक कार्य है| भारत देश के लोग अपने उत्सव जैसे की दिपावली , होली,रक्षाबंधन, नवरात्री,दशहरा,जन्माष्टमी,नाताल, ईद-ए-मिलाद , पतेती, बैसाखी जैसे त्यौहार धामधूम से मनाये जाते है , और भारतीय संस्कृति का डंका सारे विश्व में बजाते है | भारत देश के लोक मेले तो भारतीय संस्कृति का एक अहम् हिस्सा है |भारतीय शास्त्रीय नृत्य, जैसे भरतनाट्यम, कथकली, कत्थक, मणिपुरी, ओडिसी और कुचिपुड़ी मुख्य तौर पर नाट्य शास्त्र, पुराण और शास्त्रीय साहित्य और रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों के संकेतों का पालन करना भारतीय संस्कृति का एक आयना सारे विश्व के सामने है |भरता के कारीगरो की कला कारीगरी के उदहारण के रूप में ताजमहल, लाल किल्ला, कुतुबमीनार ,सोमनाथ मंदिर,पद्मनाभ स्वामी मंदिर,चर्च ,गिरजाघर जैसी कलात्मक इमारते पुराने समय से भारतीय संस्कृति का प्रचार कई सालो से पुरे विश्व में कर रहे है और एक अद्भुत कलात्मक कारीगरी का जीता जागता उदहारण है |

भारतीय संस्कृति हमें बहुत ही सिकहती है | आज नयी पीढ़िया हमारी संस्कृति को भुलाकर दुशरे देश की संस्कृत अपनाने जा रही है पर सचमे भारतीय संस्कृति को बहार के देश और लोग भी अपना रहे है , तो हम भारतीय है , तो अपनी संस्कृति को कभी भूलना नहीं चाहए ,बल्कि सरे विश्व में इसका प्रचार करना चाहए |

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