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Wednesday, 27 August 2025

“ऋषि पंचमी”-ऋषि पंचमी का महत्व और पूजाविधि-ऋषि पंचमी व्रत की कथा

  भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का प्रारम्भ बुधवार 27 अगस्त 2025 को सायं 03:44 पर हो रहा है, जो अगले दिन गुरुवार 28 अगस्त 2025 को सायं 05:56 तक रहेगी।  

 धार्मिक मान्यतानुसार, ऋषि पंचमी का अवसर मुख्य रूप से सप्तर्षि के रूप में प्रसिद्ध सात महान ऋषियों को समर्पित है। ऋषि पंचमी के दिन पूरे विधि-विधान के साथ ऋषियों के पूजन के बाद कथापाठ और व्रत रखा जाता है।  

 ऋषि पंचमी का पवित्र दिन महान भारतीय ऋषियों की स्मृति में मनाया जाता है। सप्तर्षि से जुड़े हुए सात ऋषियों के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने पृथ्वी से बुराई को खत्म करने के लिए स्वयं के जीवन का त्याग किया और मानव जाति के सुधार के लिए काम किया। हिंदू मान्यताओं और शास्त्रों में, यह उल्लेख किया गया है कि ये संत अपने भक्तों को अपने ज्ञान और बुद्धि से शिक्षित करते हैं ताकि हर कोई दान, मानवता और ज्ञान के मार्ग का पालन कर सके।

  ऋषि पंचमी का महत्व और पूजाविधि

 मान्यता है कि इस दिन व्रत रखना काफी ज्यादा फलदायी होता है इस व्रत को भक्ति और श्रद्धा के साथ किया जाता है। इस दिन ऋषियों का पूर्ण विधि-विधान से पूजन के बाद कथा सुनने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि यह व्रत लोगों के पापों का नाश करता है और अच्छे फल देता है। यह व्रत और ऋषियों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता, समर्पण और सम्मान की भावना को दर्शाता है।

 ऋषि पंचमी के दिन महिलाएं सरोवर या नदी विशेषकर गंगा में स्नान करती हैं। ऐसी मान्यता है कि रजस्वला के समय होने वाली तकलीफ तथा अन्य दोष के निवारण के लिए महिलाएं ऋषि पंचमी का व्रत करती हैं और स्नान करती हैं। आज के दिन महिलाएं सप्तऋषियों की पूजा करती हैं और दोष निवारण के लिए कामना करती हैं  पहले यह व्रत सभी वर्णों के पुरुषों के लिए बताया गया था लेकिन समय के साथ-साथ अब यह व्रत अधिकतर महिलाएँ करती है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। 

ऋषि पंचमी की पूजा में महिलाएं सप्त ऋषियों की मूर्ति बनाती हैं और उसकी पूजा करती हैं। इसमें प्रथम पूज्य श्री गणेश जी की पूजा भी की जाती है। उसके बाद ऋषि पंचमी की कथा सुनती हैं। ऋषि पंचमी के व्रत में महिलाएं फलाहार करती हैं और अन्य व्रत के नियमों का पालन करती हैं। दिन के अंत में ब्राह्मणों को भोजन कराती हैं और स्वयं पारण कर व्रत को पूर्ण करती हैं। ऐसी ही अनेकानेक पोस्ट पढ़ने के लिये हमारा फेसबुक पेज ‘श्रीजी की चरण सेवा’ को लाईक एवं फॉलो करें। अब आप हमारी पोस्ट व्हाट्सएप चैनल पर भी देख सकते हैं। चैनल लिंक हमारी फेसबुक पोस्टों में देखें। इस व्रत में दिन में एक बार भोजन करना चाहिए।

 ऋषि पंचमी की पूजा के लिए सप्तऋषियों की प्रतिमाओं की स्थापना कर उन्हें पंचामृत स्नान दें, जिसके बाद उनपर चंदन का लेप लगाएँ और फूलों एवं सुगंधित पदार्थों, दीप, धूप आदि अर्पण करें इसके साथ ही श्वेत वस्त्रों, यज्ञोपवीतों और नैवेद्य से पूजा और मंत्र का जाप करें।

ऋषि पंचमी व्रत की कथा

  काफी समय पहले विदर्भ नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहते थे, उनके परिवार में एक पुत्र व पुत्री थी। ब्राह्मण पुत्री का विवाह अच्छे ब्राह्मण कुल में कर देता है लेकिन काल के प्रभाव स्वरूप कन्या का पति अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है। जिसके बाद विधवा अपने घर लौट जाती है।

          एक दिन आधी रात में विधवा के शरीर में कीड़े पैदा होने लगते हैं। ऐसी हालत देखकर उसके पिता एक ऋषि के पास ले जाते हैं। ऋषि कहते हैं कि कन्या पूर्व जन्म में ब्राह्मणी थी और इसनें एक बार रजस्वला होने पर भी घर के बर्तन छू लिए और काम करने लगी। बस इसी पाप की वजह से इसके शरीर में कीड़े पड़ गए। 

          दरअसल, शास्त्रों में रजस्वला स्त्री का कार्य निषेध बताया गया है लेकिन इस बात पर ध्यान नहीं दिया गया और इसका दण्ड भोगना पड़ रहा है। तब ऋषि कहते हैं कि अगर वह कन्या ऋषि पंचमी का व्रत करें और पूरे श्रद्धा भाव के साथ पूजा और क्षमा प्रार्थना करे और उसे अपने पापों से मुक्ति मिल जाएगी।

          इस प्रकार कन्या द्वारा ऋषि पंचमी का व्रत करने से उसे पापों से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।

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